किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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आपका हथियार सूचना का अधिकार

इस क़ानून से जु़डी सूचनाएं हम आपको लगातार देते रहते हैं. इस अंक में हम चर्चा कर रहे हैं इस क़ानून के उस पक्ष की, जिससे आमतौर पर ज़्यादातर आवेदकों का वास्ता प़डता है. ऐसी खबरें भी आई हैं कि किसी आवेदक को सूचना क़ानून का इस्तेमाल करने पर धमकी मिली या जेल में ठूंस दिया गया या फर्ज़ी केस में फंसा दिया गया.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं

भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के बावजूद देश में टाडा जैसे क़ानून लागू हुए, मगर अपराध फैलते ही रहे. परिणाम यह हुआ कि जनता की मांग के मद्देनज़र न्याय की प्राप्ति के लिए 2005 और 2009 में विभिन्न स़िफारिशों एवं संशोधनों पर आधारित नया विधेयक प्रस्तुत किया गया. अब 2011 में पुराने क़ानूनों में संशोधन करके नया बिल पेश कर दिया गया है.

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अब लोकपाल नहीं बनेगा

हमारे देश में सरकारी तंत्र के साथ साथ भ्रष्टाचार का तंत्र भी मौजूद है. यह भ्रष्ट तंत्र देश की जनता को तो नज़र आता है, लेकिन सरकार अंधी हो चुकी है. इसलिए सरकारी तंत्र और भ्रष्ट तंत्र दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं. ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए तो सरकार के नियम क़ानून हैं, जिसके ज़रिए आपको लाइसेंस नहीं मिल सकता.

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सिर्फ नोएडा नहीं पूरे देश में किसान हिंसक हो सकते हैं

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की नीतियां कुछ और हैं और राहुल गांधी कुछ और बात करते हैं. सरकार भूमि अधिग्रहण से संबंधित वर्षों पुराने कानून में संशोधन की दिशा में कोई कदम नहीं उठाती और राहुल गांधी उसी कानून के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं, लेकिन सिर्फ वहीं, जहां गैर कांग्रेसी दलों की सरकार है.

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अन्ना हजारे से चुक हो गई

अन्ना हजारे का आंदोलन दिशाहीनता का शिकार हो गया है. दिशाहीनता कई स्तर पर नज़र आ रही है. दिशाहीनता का मतलब इस बात से है कि अन्ना हजारे और उनके सर्वगुण संपन्न मैनेजरों ने आंदोलन तो शुरू कर दिया, लेकिन वे यह अनुमान ही नहीं लगा पाए कि आने वाले दिनों में कौन-कौन सी चुनौतियां सामने आने वाली हैं.

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अन्ना की लडा़ई और साजिश की सीडी

अन्ना हजारे की लड़ाई कठिन होती जा रही है, आशंका भी यही थी. संयुक्त समिति के सदस्य शांति भूषण के विरुद्ध पहले संपत्ति की ख़रीद में कम स्टांप शुल्क अदा करने का मामला और फिर एक सीडी के ज़रिए चार करोड़ रुपये रिश्वत लेने-देने की साज़िश का सामने आना इस बात के संकेत हैं कि जन लोकपाल विधेयक का प्रारूप बिना बाधा संपन्न न होने पाए.

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सरकारी लोकपाल बनाम जन लोकपाल

आखिर क्या है जन लोकपाल? क्यों सरकार जन लोकपाल को लेकर परेशान है? असल में जन लोकपाल बिल एक ऐसा क़ानून है, जो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए किसी ताबूत से कम नहीं साबित होगा. पिछले 42 सालों में यह विधेयक कई बार क़ानून बनते-बनते नहीं बन पाया. यूपीए सरकार ने बिल का मसौदा तैयार तो किया, लेकिन सिविल सोसायटी के लोग और अब तो आम आदमी भी बिल के प्रावधानों से खुश नहीं है.

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लोकपाल विधेयकः भ्रष्‍टाचार के खिलाफ कमजोर सरकारी हथियार

एक मंत्री की वजह से देश की जनता को एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपये का चूना लग जाता है और वही जनता अगर उस भ्रष्ट मंत्री के ख़िला़फ आवाज़ उठाए तो बहुत संभव है कि उसे देशद्रोही बताकर सलाखों के पीछे कैद कर दिया जाए. यह भी संभव है कि उक्त भ्रष्ट मंत्री को अपने किए की कोई सज़ा भी न मिले.

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पंचायत के खर्च का हिसाब मांगे

गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चल कर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्री-स्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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मिड डे मील का मांगें हिसाब

केंद्र की मिड डे मील योजना के अनाज का एक हिस्सा अनेक कारणों के चलते नष्ट हो जाता है और यह स्थिति कमोबेश सभी राज्यों की है, उस पर अनाज चोरी का मामला अलग से. यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती.

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एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी

खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है.

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संसदीय सत्रों का भी ऑडिट हो

आज भारत में ऐसा एक भी संस्थान नहीं है, जिसके कार्यकलापों का एक निश्चित अवधि में अंकेक्षण (ऑडिट) न किया जाता हो. अंकेक्षण समय की मांग और ज़रूरत दोनों है. यह वह हथियार है, जिसके माध्यम से हम किसी भी संस्थान की ख़ामियों का पता लगा सकते हैं और उनका निराकरण कर सकते हैं.

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