अराजकता का लाइसेंस नहीं स्वायत्तता

समकालीन भारतीय साहित्य इन दिनों संघर्ष, विरोध, प्रतिरोध, प्रदर्शन, प्रति प्रदर्शन, पुरस्कार वापसी आदि जैसे शब्दों से गूंज रहा है.

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पुस्तक समीक्षा हिचकी : नए साहित्यिक सृजन की ओर एक क़दम

पिछले दिनों नोएडा में एक भव्य कार्यक्रम में कला, साहित्य, संस्कृति और मानविकी को समर्पित एक नई हिंदी मासिक पत्रिका

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पुरस्कार वापसी से प्रचार की पिपासा

कन्नड़ के लेखक प्रोफेसर एमएम कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्यक और सांस्कृतिक जगत उद्वेलित है. सोशल मीडिया से

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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सौ साल का हिंदी सिनेमा

सौ साल पहले रूपहले पर्दे पर वर्ष 1913 में 21 अप्रैल को पहली श्वेत-श्याम हिंदी मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र को दर्शकों ने देखा, तो सबको अजूबा लगा. फिल्मी पर्दे पर पहले-पहल वह नज़ारा सचमुच स्वप्न लोक जैसा ही था. राजा हरिश्चंद्र फिल्म के निर्देशक, निर्माता और लेखक दादा साहब फाल्के थे, जिन्होंने इंग्लैंड जाकर फिल्म तकनीक सीखने के लिए ज़ेवर बेच दिए थे और उनका यह प्रयास मील के पत्थर की तरह साबित हुआ.

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मूल्यांकन में आलस क्यों

कौन जानता था कि सिमरिया घाट के बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर तू आंसू के कण बरसाता चल. यह वही बालक था, जो बाद में राष्ट्रकवि बना और जिनका नाम था रामधारी सिंह दिनकर. रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि थे.

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किताबों की दुनिया और बच्चे

दौड़ती-भागती दुनिया और तेज़ी से होता आधुनिकीकरण. बच्चों की तो दुनिया ही बदल गई है. टीवी और इंटरनेट ने उन्हें किताबों और साहित्य से कोसों दूर कर दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार ने बच्चों की साहित्यक रूचि का मंच प्रदान करने और वरिष्ठों के बीच बिठाकर उनकी प्रतिभा को निखारने की योजना बनाई है. इसकी शुरुआत राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद ने कर भी दी है.

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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अदम गोंडवी : आम आदमी का शायर

शब्द-शब्द संघर्ष करने वाले साहित्य जगत के शिल्पकार रामनाथ सिंह उ़र्फ अदम गोंडवी नहीं रहे. ग़ुरबत में ज़िंदगी ग़ुजार कर साहित्य की सेवा करने वाले अदम गोंडवी ने अभाव में ज़िंदगी के ताप को महसूस कराने के लिए अपने गांव आटा परसपुर (गोंडा, उत्तर प्रदेश) की ओर से साहित्यानुरागियों का ध्यान खींचने के लिए क़लम को तलवार बनाते हुए कहा था

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