बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

Read more

आरटीआई का इस्तेमाल ऐसे करें

हमारे पास पाठकों के ऐसे कई पत्र आए, जिनमें बताया गया कि आरटीआई के इस्तेमाल के बाद किस तरह उन्हें परेशान किया गया या झूठे मुक़दमे में फंसाकर उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया गया. यह एक गंभीर मामला है और आरटीआई क़ानून के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद से ही इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं.

Read more

दिल्ली का बाबू: काम के बोझ के मारे

प्रवर्तन निदेशालय की जांच की गति कुछ शिथिल होती दिख रही है. इसका कारण हाई प्रोफाइल मुकदमों से निपटने का दबाव अथवा काम की अधिकता हो सकता है. निदेशालय पर हसन अली मनी लांड्रिंग, 2-जी स्पेक्ट्रम, आईपीएल, कॉमनवेल्थ और हाल में चर्चा में आए 400 करोड़ के बैंक घोटाले की जांच का भार है.

Read more

सुप्रीम कोर्ट में बदलाव ज़रूरी है

इस विषय के बारे में लिखने में एक अलग रोमांच है, इसलिए मैं बहुत सी ऐसी बातें यहां लिख सकता हूं, जो कि मैं उच्चतम न्यायालय में जजों के सामने बहस करते समय नहीं बोल सकता. जब बात होती है कि भारतीय न्यायपालिका के साथ क्या परेशानियां हैं तो हमें जवाब में हां या न कहना पड़ता है, लेकिन मेरा जवाब हां भी है और न भी. मैं उच्चतम न्यायालय में वर्ष 1979 से हूं.

Read more

सरकार जीने का हक़ दे या फिर मौत

अरुणा शानबाग के बहाने देश में इच्छा मृत्यु के मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई है, मगर क्या कभी सरकार ने यह सोचा है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कोताही के कारण कितने लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं. ये लोग किससे इच्छा मृत्यु की फरियाद करें.

Read more