बाबरी केस में आडवाणी-जोशी-उमा के खिलाफ आपराधिक साजिश का आरोप तय

नई दिल्ली : सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने बाबरी विवाद की सुनवाई करते हुए दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली

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नेहरू नहीं होते तो कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होता

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में नेहरू मेमोरियल म्यूजियम में एक समारोह का आयोजन हुआ. विषय की गंभीरता को देखते

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ललित मोदी प्रकरण : भाजपा के अंदर मचे शीतयुद्ध का नतीजा है

ललित मोदी प्रकरण से मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी की छवि खराब हुई है. यह बात किसी से छिपी

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सरकार की नीतियां क्या होंगी

नए प्रधानमंत्री को बड़ी परियोजनाएं प्रिय हैं, जैसे बुलेट ट्रेन, नदियों का एकीकरण आदि.अब अमेरिकी कंपनियों और पश्‍चिमी देशों से

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अब अन्ना की नहीं, आपकी परीक्षा है

अन्ना हज़ारे और जनरल वी के सिंह ने बनारस में छात्रों की एक बड़ी सभा को संबोधित किया. मोटे अनुमान के हिसाब से 40 से 60 हज़ार के बीच छात्र वहां उपस्थित थे. छात्रों ने जिस तन्मयता एवं उत्साह से जनरल वी के सिंह और अन्ना हज़ारे को सुना, उसने कई संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिए. पर सबसे पहले यह देखना होगा कि आख़िर इतनी बड़ी संख्या में छात्र अन्ना हज़ारे और वी के सिंह को सुनने के लिए क्यों इकट्ठा हुए, क्या छात्रों को विभिन्न विचारों को सुनने में मज़ा आता है, क्या वे नेताओं के भाषणों को मनोरंजन मानते हैं, क्या छात्रों में जनरल वी के सिंह और अन्ना हज़ारे को लेकर ग्लैमरस क्रेज़ दिखाई दे रहा है या फिर छात्र किसी नई खोज में हैं?

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आडवाणी जी बधाई के पात्र हैं

श्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर एक कमेंट लिखा और उस कमेंट पर कांग्रेस एवं भाजपा में भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री, जो भविष्य में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बन सकते हैं, ने कहा कि भाजपा ने अपनी हार मान ली है. मंत्री महोदय यह कहते हुए भूल गए कि उन्होंने अपनी बुद्धिमानी से लालकृष्ण आडवाणी जी के आकलन को वैधता प्रदान कर दी.

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आरएसएस का चक्रव्‍यूह

हिंदुस्तान में सदियों से संयुक्त परिवार की प्रथा चली आ रही है. इस व्यवस्था में परिवार का मुखिया जो अक्सर बुज़ुर्ग होता है, उसके ऊपर परिवार को एक रखने और उसे चलाने की ज़िम्मेदारी होती है. आम तौर पर आज भी हिंदुस्तान में ज़्यादातर घरों में पीढ़ी दर पीढ़ी बंटवारा नहीं होता. जबसे पश्चिम का प्रभाव अपने देश पर बढ़ा है, तबसे परिवारों में बंटवारे का चलन बढ़ गया है, पर यह अभी भी अपवाद स्वरूप ही है.

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संघ नहीं चाहता भाजपा मज़बूत हो

यह हमेशा विवाद का विषय रहा है कि विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करके लड़ा जाए या चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुना जाए. ठीक उसी तरह, जैसे लोकसभा चुनाव में कुछ पार्टियां प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करके लड़ती हैं, कुछ पार्टियां ऐसा नहीं करती हैं. 2004 में भाजपा ने आडवाणी जी को प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग कहकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने किसी को भी अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था.

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भाजपा में गैंग वार

भारत में गठजोड़ बनाकर सत्ता संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी इन दिनों एक दु:खद अंतर्कलह से ग़ुजर रही है. लगभग सात साल में तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके श्री अटल बिहारी वाजपेयी इन दिनों बीमार हैं.

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भाजपा में गृहयुध्‍द

महाभारत की लड़ाई में कौरवों के साथ ज़्यादा बड़े-बड़े योद्धा थे, फिर भी वे युद्ध हार गए. वजह यह थी कि कौरवों की सेना में सेनापति से लेकर कई बड़े-बड़े महारथी तो थे, लेकिन उनमें एकता नहीं थी. युद्ध के दौरान बड़े-बड़े योद्धा एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे.

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दिशाहीन भाजपा

प्रजातंत्र में विपक्ष का एक रोल होता है. देश की जनता अगर किसी दल को यह दायित्व देती है तो इसका मतलब यह है कि अगले पांच सालों तक वह पार्टी सरकार के कामकाज और नीतियों पर नज़र रखे. सरकार अगर कोई ग़लती करती है तो उसे जनता के सामने लाए और संसद में सत्तारू़ढ पार्टी से जवाब तलब करे.

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संसद के सेंट्रल हॉल में स्व. चंद्रशेखर के चित्र का अनावरण

चार मई को संसद के सेंट्रल हॉल में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के चित्र का अनावरण किया गया. अनावरण उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी के हाथों संपन्न हुआ.

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अरे! मैं नितिन गडकरी हूं

भारतीय जनता पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता एवं देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिन का मौका था. जन्मदिन की बधाई देने के लिए देश के कई नेता मौजूद थे. इस खास मौक़े पर अनूप जलोटा सभी को भजन एवं ग़ज़लें सुना रहे थे.

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पुस्‍तक अंश-मुन्नी मोबाइल-2

दो साल बाद देश में 1998 में चुनाव हुए. एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी ने जोड़-तोड़कर सरकार बनाई. दक्षिण की नेत्री जयललिता के गुस्से का शिकार होकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को फिर जाना पड़ा. 1999 में हुए चुनाव में हिंदू ब्रिगेड पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पार्टी के लौह पुरुष रामरथी लालकृष्ण आडवाणी ने राम के नाम पर फिर वोट मांगे. जनता झांसे में आ गई.

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नितिन गडकरी का एजेंडा

नितिन गडकरी ने भाजपा की कमान ऐसे वक्‍त में संभाली है, जब यह पार्टी कई स्‍तर पर, कई दिशाओं से बिखर रही है। बिखराव की सबसे बड़ी वजह संघ और भाजपा के रिश्‍तों को लेकर है। भाजपा पर किसका अधिकार हो, इस बात को लेकर भारतीय जनता पार्टी दो धड़ों में बंटी है।

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पुस्तक अंश-मुन्नी मोबाइल

अहमदाबाद का उनका अनुभव सबसे अलग-थलग था. वहां की यादों से आनंद भारती अब भी सिहर उठते हैं. गोधरा कांड उनकी आंखों से गुज़रा था. उनकी कलम ने उस सच्चाई को बे़खौ़फ अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाया था. अ़खबार की लोकप्रियता भी बढ़ी थी पर स्वयं आनंद भारती के लिए उन दिनों की यादें मीठी कम और तीखी ज़्यादा रही हैं. वह कभी उन्हें याद नहीं करना चाहते, पर वे यादें ऐसी हैं जो कि रील की तरह उनके साथ चलती रहती हैं.

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वाजपेयी जी संघ का सभ्य मुखौटा हैं!

अयोध्या की आपराधिक घटना के बाद जल्द ही दिल्ली में उन्होंने एक और नाटक का मंचन किया. उन्होंने घोषणा की कि वह राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. अगर कोई बहुत मूर्ख होता (वहां पर्याप्त पत्रकार थे) तो उसे विश्वास होता कि वह राजनीति छोड़ रहे हैं. वाजपेयी जी अपनी ज़ुबान के कितने पक्के थे, यह इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि उन्होंने दो मर्तबा प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी संभाली.

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प्रभाष जी गांधीवादी विचारधारा की उपज थे

प्रभाष जी की सोच की बुनियाद ही गांधी दर्शन और मूल्यों पर टिकी है. विनोबा जी के आंदोलन से भी वह सक्रिय तौर पर जुड़े रहे. वह सर्वोदय के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे. लोगों को जागरूक और संगठित करने का काम तो वह निरंतर करते रहे. उन्हें क़रीब से जानने वाले लोगों को पता होगा कि उनकी जीवन यात्रा की शुरुआत ही सर्वोदय से हुई थी. आचार्य विनोबा भावे इंदौर आए हुए थे और वहां एक माह से अधिक समय तक वह रुके थे. वहां उन्होंने अशोभनीय पोस्टर के खिला़फ एक अभियान चलाया था.

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कांग्रेस और भाजपा में कुछ तो फर्क़ हो

विपक्ष का नेता शेर होता है जो दिन रात आम लोगों की तकली़फों को लेकर सरकार पर गरजता रहता है तथा सरकार को मजबूर करता है कि वह आम लोगों के हितों को अनदेखा न करे, उनकी समस्याएं सुलझाए.

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जसवंत से घबराएं अनंत

भाजपा से निष्कासित जसवंत सिंह संसदीय लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पद पर अभी भी बने हुए हैं. भाजपा मेंउनके कई पुराने साथी उनकी इस पद से भी विदाई चाहते हैं. अनंत कुमार भी. आखिर किस बात को लेकर इतने भयभीत हैं अनंत? क्या उन्हें किसी राज के उजागर हो जाने का भय सता रहा है?

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आडवाणी की नियति है कि वे सूरज बनकर चमक नहीं सकते

आडवाणी सज्जन पुरुष हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह दब्बू भी हैं, कई बार उन्होंने कड़े फैसले भी किए हैं न केवल दूसरों के बारे में, बल्कि अपने बारे में भी. ऐसा ही एक कड़ा निर्णय था 1973 में पहली बार जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद प्रो. बलराज मधोक को पार्टी से निष्कासित करने का. उन दिनों मधोक की गिनती जनसंघ के प्रमुख नेताओं में होती थी और वह अपने को अटल बिहारी के समकक्ष मानते थे.

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