पद्मावती के भारी विरोध के बीच दीपिका के बोल्ड फोटोशूट ने मचाई सनसनी

इन दिनों बॉलीवुड की सबसे बिंदास अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अपनी आने वाली फिल्म पद्मावती को लेकर चर्चाओं में हैं दरअसल

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‘द अमेरिकन इंटरेस्ट’ की रिपोर्ट : शक्तिशाली देशों की लिस्ट में भारत छठवें पायदान पर

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : अमेरिकी विदेश नीति से सम्बंधित एक पत्रिका ने 2017 में दुनिया के आठ शक्तिशाली देशों

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अधिकारों से वंचित हैं मुस्लिम महिलाएं

दुनिया की तक़रीबन आधी आबादी महिलाओं की है. इस लिहाज़ से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. कमोबेश दुनिया भर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है. अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है, ख़ासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है.

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संगकारा विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर

क़्रिकेट की बाईबल कही जाने वाली क्रिकेट पत्रिका विजडन ने पूर्व श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा को वर्ष 2011 का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया है.

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पाठकों तक किताबों का पहुंचना ज़रूरी

हिंदी में जब मैंने पुस्तकों की समीक्षा लिखने का काम शुरू किया था तो समीक्षा के लिए किताबें अख़बारों से या लघु पत्रिकाओं से मिला करती थीं. जिस अख़बार या पत्रिका से समीक्षा लिखने का हुक्म जारी होता था तो वहां से पुस्तकें भेजी जाती थीं या फिर अगर दफ्तर जाता था तो वहां से ही किताबें दे दी जाती थीं.

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बनारस को जानिए-समझिए

आत्म प्रचार और विज्ञापन के इस दौर में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी प्रतिदान की अपेक्षा के बग़ैर चुपचाप निष्ठापूर्वक अपना काम किए जा रहे हैं. ऐसे ही एक शख्स हैं लेखक-पत्रकार कमल नयन. कमल जी के आलेख का़फी पहले साहित्यिक पत्रिका धर्मयुग में प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे.

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पत्रिकाओं से बनता परिवेश

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हिंदी के विकास में इनकी एक ऐतिहासिक भूमिका भी रही है. व्यवसायिक पत्रिकाओं के विरोध में शुरू हुए लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन ने एक व़क्त हिंदी साहित्य में विमर्श के लिए एक बड़ा और अहम मंच प्रदान किया था, लेकिन बदलते व़क्त के साथ इन पत्रिकाओं की भूमिका भी बदलती चली गई.

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आलोचक का अकेलापन

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, माधुरी, कल्पना एवं रूपाभ से लेकर हंस, पहल एवं तद्‌भव तक. साठ के दशक में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसने कई दशकों तक साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप किया. 86 के दशक में जब राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का संपादन शुरू किया तो वह एक बेहद अहम साहित्यिक घटना साबित हुई.

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पच्चीस का हंस

आज से पच्चीस साल पहले जब अगस्त 1986 में राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरू किया था, तब किसी को भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यह पत्रिका निरंतरता बरक़रार रखते हुए ढाई दशक तक निर्बाध रूप से निकलती रहेगी, शायद संपादक को भी नहीं. उस व़क्त हिंदी में एक स्थिति बनाई या प्रचारित की जा रही थी कि यहां साहित्यिक पत्रिकाएं चल नहीं सकतीं.

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समकालीन साहित्‍य में सार्थक हस्‍तक्षेप

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्घ इतिहास रहा है. दरअसल हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिका के जवाब के रूप में की गई. इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं. उन्होंने 1957 में बनारस से कवि का संपादन-प्रकाशन शुरू किया था.

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हुआ ये क्या कि ख़ामोशी भी गुनगुनाने लगी – शहरयार

स़िर्फ और स़िर्फ यही एक तसल्ली की बात है कि इस बदलते हुए बेचैन व़क्त और बदहवास दौर में मुक़म्मल तहज़ीब का ऩक्शा तैयार करते शायर शहरयार हमारे साथ हैं, नहीं तो हम भी यही कहते हैं, आंखों से कहो अब मांगे ख्वाबों के सिवा जो चाहे..

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