समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट

हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है.

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अब बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में : सरकार भ्रम फैला रही है

साल 2012 में हमें यह सोचकर खुश होना चाहिए कि समाज के कर्णधार यानी हमारी नौजवान पी़ढी अब ज़्यादा स्वस्थ हो रही है. देश के सर्वोच्च स्वास्थ्य संस्थान एम्स द्वारा 19 ब़डे शहरों में किए गए सर्वे के अनुसार, साल 1992 के मुक़ाबले 2012 के युवा ज़्यादा लंबे और वज़न में भारी हो रहे हैं. इसी तथ्य पर सरकार यह मानती है कि पोषण में पौष्टिकता ब़ढने की वजह से बच्चे अब स्वस्थ हो रहे हैं.

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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मिड डे मील की कछुआ चाल

स्‍कूलों में मिलने वाला दोपहर का भोजन यानी मिड डे मील भी बच्चों को कुपोषण से बचाने में सहायक साबित नहीं हो पा रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं. इसके कारण उनका शारीरिक विकास रुक गया है.

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जन्म से पहले की भूख

गरीबों के नाम पर योजनाएं ढेर सारी हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है. भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है. इसी तरह 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं.

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भूख से खत्‍म होती जिंदगी

इधर सरकारी गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है उधर कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. इस भयावह तस्वीर के बीच शासन-प्रशासन के अधिकारी खूब फल-फूल रहे हैं.

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पोषण आहार कार्यक्रम माफियाओं के कब्‍जे में

बच्चों, गर्भवती तथा नवप्रसूता माताओं में कुपोषण की गंभीर समस्या भारत सरकार और राज्य सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति सबसे भयावह और मारक बनी हुई है.

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विंध्य क्षेत्र में बच्चों की उपेक्षा

कुपोषण के कारण ग़रीबी में जी रहे हज़ारों बच्चों की मौत की दर में सतना ज़िला अव्वल है. राज्य सरकार द्वारा बच्चों की सुरक्षा और सेहत के मामले में जारी किए गये कोई भी निर्देश सतना में प्रभावशील नहीं है. पिछले चार वर्षों के दौरान राज्य सरकार ने राज्य में बच्चों की सुरक्षा पर हर साल औसतन दो रुपये और स्वास्थ्य पर पंद्रह रुपये खर्च किए हैं.

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रोटी के नाम पर धोखा

गरीबों का पेट भर सकने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल में तमाम विसंगतियां हैं, जो भारत की ग़रीब जनता के हित में नहीं है. महिला बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय और कृषि एवं खाद्य मंत्रालय भूख और ग़रीबी के उन्मूलन के लिए कुल 25 योजनाएं चला रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में इन योजनाओं का नतीजा कहीं देखने को नहीं मिल रहा है.

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महिला-बाल व्‍यापार का बढ़ता जाल

बाज़ारवाद के इस युग में मनुष्य भी बिकाऊ माल बन गया है. बाज़ार में पुरूष की ज़रूरत श्रम के लिए है, तो वहीं स्त्री की ज़रूरत श्रम और सेक्स दोनों के लिए है. इसलिए व्यापारियों की नज़र में पुरूष की तुलना में स्त्री कहीं ज़्यादा क़ीमती और बिकाऊ है. राजधानी भोपाल की 66 बालिकाएं और 70 बालक ऐसे हैं जिनका पिछले एक साल से कोई अता-पता नहीं है.

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अनाज के लिए तरसते आदिवासी

मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले के कोरकू आदिवासी बहुल खालवा विकासखंड में आदिवासी अनाज के लिए तरस रहे हैं. पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के समय यह क्षेत्र भुखमरी से पीड़ित आदिवासियों की व्यथा-गाथा के कारण चर्चा में आया था. लगभग दो माह की अवधि में खालवा में 50 से ज़्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय काल के गाल में समा गए.

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कुपोषण हजारों बच्‍चों को लील रहा है

मध्य प्रदेश में प्रतिवर्ष 30 हजार बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले ही बेमौत मर जाते हैं. ये वो अभागे बच्चे हैं, जो जन्म से ही कुपोषण के शिकार होते हैं और जन्म के बाद पोषण आहार की कमी के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं.

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