भारतीय मुस्लिम महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी हो या नहीं, इस प्रश्न पर मौलाना हज़रात ने फिर राजनीति शुरू कर दी है. प्रश्न यह नहीं कि धर्मगुरुओं ने पहली बार महिलाओं के मौलिक अधिकारों एवं भारतीय संविधान के अधिकारों की अनदेखी की है, बल्कि शायद हमारे मौलाना हज़रात इसे अपना पहला कर्तव्य समझते हैं कि महिलाओं को मूल धारा से न जुड़ने दिया जाए, जैसा कि कुछ राजनीतिक दल इसका उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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