घूमने मत जाना मेडल लेकर आना

हर एथलीट का सपना होता है कि वह ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करे. वहां मेडल जीते और देश को गौरान्वित करे. जीत के क़रीब पहुंचकर मेडल नहीं जीत पाने का दर्द उड़न सिख मिल्खा सिंह और उड़न परी पी टी ऊषा से बेहतर कौन समझ सकता है, जिन्हें आज तक ओलंपिक में पदक न जीत पाने का मलाल है. भारत ने पहली बार 1928 में ओलंपिक खेलों में भाग लिया था.

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लंदन ओलंपिक : भारतीय हॉकी टीम की तैयारी

भारत ने अजलान शाह कप हॉकी में कांस्य पदक जीत लिया है. पिछले साल इस प्रतियोगिता में विजेता रही भारतीय टीम अपना ख़िताब नहीं बचा पाई, क्योंकि इस बार यह प्रतियोगिता ब्लू-पिंक एस्ट्रो टर्फ पर खेली गई.

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गांव की मिट्टी और देश का गौरव

हाल में दीपिका कुमारी ने तीरंदाज़ी विश्वकप में स्वर्ण पदक जीता. वह भी लंदन ओलंपिक खेलों के आयोजन के कुछ महीने पहले. देशवासी दीपिका से ओलंपिक मेडल की आस लगाने लगे हैं. आस लगाने वालों में हमारी सरकार भी शामिल है. खिलाड़ी पदक जीतते ही देश के लाल हो जाते हैं, सरकार कुछ दिन तक खिलाड़ियों का गुणगान करती है.

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अभिनय का कमाल

देर से ही सही, लेकिन अभिनव बिंद्रा ने किसी बड़े कंपटीशन में स्वर्ण पदक जीतने के सूखे को ख़त्म कर दिया. बीजिंग ओलंपिक के बाद से अभिनव को इस प्रदर्शन की तलाश थी, जो दोहा (कतर) में शुरू हुई एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप में पूरी हुई.

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डोपिंग का जाल : सिर्फ खिलाडी और कोच दोषी नहीं

भारत के ज़्यादातर खेल पहले से ही क्रिकेट के मायाजाल में फंसकर खुद के अस्तित्व के लिए तरस रहे हैं, ऐसे में डोपिंग के बढ़ते मामलों ने उन उभरते हुए खेलों और खिलाड़ियों को हाशिए पर डालने का काम किया है, जो किसी तरह क्रिकेट के बाज़ार के बीच अपने स्वर्ण पदकों की बदौलत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे.

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भारत की उम्मीदें फिर टूटीं

भारतीय मुक्केबाज़ों का क्यूबा के हवाना में चल रही गिराल्डो कोर्दोवा कार्डिन मेमोरियल मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका और उन्हें केवल एक रजत और पांच कांस्य पदकों के साथ संतोष करना पड़ा. भारत के छह मुक्केबाज़ सेमीफाइनल में पहुंचे थे लेकिन इनमें से कोई भी स्वर्ण पदक जीतने में सफल नहीं हो सका.

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सैफ गेम्‍स में भारत का जलवा कायम

औली में आयोजित सैफ विंटर गेम्स की स्कीइंग प्रतिस्पर्धाओं में भी भारतीय खिलाडि़यों का जलवा कायम रहा. भारत के भाल हिमालय की कोख में बसे औली की बर्फीली ढ़लानों पर पहले दक्षिण एशियाई शीत कालीन खेलों के दूसरे चरण की शानदार शुरुआत हुई.

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भारतीय टेनिस का नया सूर्य सोमदेव

भारत में टेनिस के खेल की एक खासियत रही है. यहां ऐसे खिलाड़ी कम ही पैदा हुए हैं, जो विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकें, लेकिन हर दौर में कम से कम एक खिलाड़ी ज़रूर रहा है, जो अपनी उपलब्धियों से हमें गौरव का एहसास कराता रहा है. पहले रामनाथ कृष्णन, फिर रमेश कृष्णन एवं विजय अमृतराज और उसके बाद लिएंडर पेस एवं महेश भूपति. बीच में सानिया मिर्ज़ा भी आईं, लेकिन उनकी उम्मीदों का सितारा चमकने से पहले ही रास्ते से भटक गया. अब जबकि लिएंडर पेस एवं महेश भूपति अपने करियर के आख़िरी पड़ाव पर हैं, सानिया कोर्ट से ज़्यादा अपना परिवार बसाने में व्यस्त हैं, ऐसे में भारतीय टेनिस प्रेमियों के दिल में एक ही सवाल कौंध रहा था कि अंतरराष्ट्रीय टेनिस में भारत का अगला झंडाबरदार कौन होगा? पिछले एक साल के प्रदर्शन पर ग़ौर करें तो सोमदेव देवबर्मन ने एक नई उम्मीद पैदा की है. हालांकि एटीपी रैंकिंग में वह अभी भी टॉप 100 से बाहर हैं, लेकिन हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों और खासकर कॉमनवेल्थ एवं एशियाई खेलों में उनके प्रदर्शन को देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में भारतीय टेनिस नायकविहीन नहीं रहेगा.

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नायकों को सलामः सोना मिला, सोने जैसे खिलाड़ी भी

38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य यानी कुल 101 पदक. यह है 19वें राष्ट्रमंडल खेल में भारत की तस्वीर. खेलों के आठ दशकों के इतिहास में पहली बार भारत ने राष्ट्रमंडल खेल में दूसरा स्थान हासिल किया. शानदार प्रदर्शन और खेलों के सफल आयोजन का सेहरा अपने-अपने सिर बांधने की प्रतिस्पर्धा में शीला दीक्षित और सुरेश कलमाडी की ज़ुबान थक नहीं रही है, लेकिन हम आपको इस सबसे एक अलग कहानी बताते हैं.

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निराश होने की ज़रूरत नहीं है

हम इतने पराजयवादी क्यों हो गए हैं? माना कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कॉमनवेल्थ के नाम पर पैसों की लूट के इस हैरतअंगेज और उपहास योग्य घोटाले की परतें खोलकर रख दीं, लेकिन इससे क्या होता है. दुनिया भर के मीडिया ने भारत की छवि की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपॉल के उस सपने को हक़ीक़त में तब्दील कर दिया, जिसे उन्होंने पहली बार एन एरिया ऑफ डार्कनेस में काग़ज़ पर उतारा था, लेकिन इसमें इतना निराश होने की क्या ज़रूरत है?

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कॉमनवेल्थ गेम्स का खेल से कोई रिश्ता नहीं है

हम कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य को शायद नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, समस्या खेलों के साथ नहीं है, बल्कि समस्या तो कॉमनवेल्थ के साथ है. कॉमनवेल्थ के गठन की शुरुआत में ब्रिटेन खेलों के आयोजन को लेकर गंभीर रहता था, क्योंकि यह उपनिवेशों की प्रगति को जानने का एक अच्छा ज़रिया था, लेकिन अब तो महारानी की भी इसमें कोई रुचि नहीं है.

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