उकसावे और ध्रुवीकरण की राजनीति का प्रयोगस्थल बन गया सहारनपुर : सियासत जारी, हिंसा जारी

सहारनपुर का मसला दिल्ली तक पहुंच गया. अंबेडकर जयंती से उठा विवाद अब तक सुलग रहा है. सहारनपुर विवाद में

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मेरठ में शादी के दौरान हड़कंप, दुल्हे ने उतारा चश्मा तो उड़े सब के होश

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : उत्तर प्रदेश के मेरठ में बुधवार को एक ऐसा वाकया सामने आया जिसकी वजह से

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यूपी के आम मतदाताओं को रास नहीं आ रहा अखिलेशवादी रवैया : अपनों से बैर, गैरों से प्रेम

आम मुस्लिम मतदाताओं और उर्दू सहा़िफयों की राय से मिल रहे हैं भविष्य के संकेत अपनों से बैर और परायों

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ज़हरीली शराब का कहर : प्याले से निकली मौत

मुंबई में ज़हरीली शराब ने एक बार फिर कहर बरपा दिया. बीते 17-18 जून को मालवणी थाना अंतर्गत लक्ष्मी नगर

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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को लिखा पत्र : विकास के काम में सेना डाल रही बाधा

सेना की ज़मीनें अतिक्रमण का शिकार हो रही हैं, लेकिन उन ज़मीनों को अवैध कब्जों से मुक्त कराने की कोई

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राजनीतिक दंगे

हालात खराब होते ही अगर पुलिस अपनी कार्रवाई जल्द शुरू कर दे तो दंगे नहीं भ़डकते हैं. पुलिस को अक्सर

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मुज्जफरनगर दंगों का चुनावी असर

हो सकता है मज़फ़्फ़रनगर दंगे की साज़िश राजनीतिक पार्टियों ने अपने फ़ायदे के लिए रची हो, लेकिन वहां इसके मूल

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जब तोप मुकाबिल हो : यह हमारे लिए परीक्षा की घ़डी है

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री और अधिकारियों को स़ख्ती के साथ उन ताक़तों को रोकना चाहिए, जो उत्तर प्रदेश का

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लम्हों की खता से सदियों को बचाना होगा

इन दंगों की वजह से पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक तानेबाने को चोट पहुंची है. चोट यहां की उस सामाजिक

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश : दुधारू पशुओं की क़त्लगाह

दोआब स्थित मेरठ और उसके आसपास के क्षेत्रों में कभी दूध-दही की नदियां बहती थीं. बुलंदशहर, बाग़पत एवं मुज़फ्फरनगर में डेयरी उद्योग चरम पर था. पशुपालन और दुग्धोपार्जन को गांवों का कुटीर उद्योग माना जाता था, लेकिन जबसे यहां अवैध पशु वधशालाएं बढ़ीं, तबसे दूध-दही की नदियों वाले इस क्षेत्र में मांस और शराब का बोलबाला हो गया.

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Election News Line Episode – 49

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लाइन में खडा़ किया गोली मारी और लाशें बहा दीं

अगर न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित होना है तो यह कह सकते हैं कि मेरठ के मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है. मई 1987 में हुआ मेरठ का दंगा पच्चीसवें साल में आ चुका है. इस दंगे की सबसे दर्दनाक दास्तां मलियाना गांव और हाशिमपुरा में लिखी गई. खाकी वर्दी वालों का जुर्म हिटलर की नाजी आर्मी की याद दिलाता है.

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ज़ख्म आज भी ताज़ा हैं

वक्त बदला, हालात बदले, लेकिन नहीं बदली तो, ज़िंदगी की दुश्वारियां नहीं बदलीं. आंसुओं का सैलाब नहीं थमा, अपनों के घर लौटने के इंतज़ार में पथराई आंखों की पलकें नहीं झपकीं, अपनों से बिछ़डने की तकली़फ से बेहाल दिल को क़रार न मिला. यही है मेरठ के दंगा पी़डितों की दास्तां. मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई, 1987 और मलियाना गांव में 23 मई, 1987 को हैवानियत का जो नंगा नाच हुआ, उसके निशान आज भी यहां देखे जा सकते हैं.

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बंद कमरे में यौनेच्छा का विस्फोट

हिंदी में अनुवाद की स्थिति अच्छी नहीं है. विदेशी साहित्य को तो छोड़ दें, अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे श्रेष्ठ साहित्य भी हिंदी में अपेक्षाकृत कम ही उपलब्ध हैं. अंग्ऱेजी में लिखे जा रहे रचनात्मक लेखन को लेकर भी हिंदी के प्रकाशकों में खासा उत्साह नहीं है. हाल के दिनों में पेंग्विन प्रकाशन ने कुछ अच्छे भारतीय अंग्ऱेजी लेखकों की कृति का अनुवाद प्रकाशित किया है, जिनमें नंदन नीलेकनी, नयनजोत लाहिड़ी, अरुंधति राय की रचनाएं प्रमुख हैं. पेंग्विन के अलावा हिंदी के भी कई प्रकाशकों ने इस दिशा में पहल की है, लेकिन उनका यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है.

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