आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.
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सूबे के विभिन्न विभागों में घपलों और घोटालों की खबरें अक्सर उजागर होती रहती हैं. इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि दस वर्षों के दौरान एक भी चुनी हुई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. आयाराम-गयाराम की तर्ज पर लोकतांत्रिक सरकारों का कार्यकाल रहा.
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काफी जद्दोजहद के बाद झारखंड में ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू हुआ. केंद्र सरकार के दिशानिर्देश पर सूबे में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और नक्सलियों पर नकेल कसने के उद्देश्य से यह अभियान जारी है.
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कैपिटल पनिशमेंट, जिसे मृत्यु दंड या फांसी के नाम से भी जाना जाता है, का मुद्दा उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच अक्सर गर्मागर्म बहस का कारण बनता रहा है. मृत्यु दंड के ख़िला़फ तर्क देते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है, मृत्यु दंड मानवाधिकारों के उल्लंघन की पराकाष्ठा है. वास्तव में यह न्याय के नाम पर व्यवस्था द्वारा किसी इंसान की सुनियोजित हत्या का एक तरीक़ा है.
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पिछले डेढ़ दशकों से असम के दो पहाड़ी ज़िलों में दहशत फैला रहे उग्रवादी संगठन डी एच डी (जे) उ़र्फ ब्लैक विडो के आत्मसमर्पण के साथ ही दोनों ज़िलों में शांति बहाली की उम्मीद पैदा हुई है. नृशंसतापूर्वक नरसंहारों को अंजाम देने वाले इस उग्रवादी संगठन के हथियार डाल देने के बावजूद आम लोग उत्तर कछार पर्वतीय ज़िले और कार्बी आंग्लांग ज़िले में स्थायी रूप से शांति की बहाली को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. असम की जनता इस तरह के आत्मसमर्पण और संघर्ष विराम के कई प्रसंगों को देख चुकी है और उसे इस बात का कड़वा अनुभव है कि हथियार डाल देने के बावजूद उग्रवादी संगठन हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ पाते. दूसरी तऱफ शांति प्रक्रिया के प्रति ढुलमुल रवैया अपनाकर सरकार भी उग्रवादियों को नए सिरे से हथियार उठाने का मौक़ा प्रदान करती है. जनता के मन में सवाल है कि डीएचडी (जे) के हथियार डाल देने से शांति क़ायम हो पाएगी या पहले की तरह उग्रवाद का आतंक
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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