सारे नेता बिजली की बेमानी बहस में जनता को भटकाते रहे : घोटालों पर चुप्पी साधे रहे…

बिजली सम्पदा की ऐतिहासिक लूट पर किसी भी नेता ने नहीं उठाई उंगली उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस

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समाजवादी सरकार ने पूरे किए चार साल : सपा को सर्वे से मलाल

मार्च 2012 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई समाजवादी सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिए. समाजवादी

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नाबालिग बता कर सपा नेता की बिटिया की शादी रुकवा दी, जनता स्तब्ध रह गई : दुष्ट दारोगा की बेशर्म करतूत

एक तरफ उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार प्रदेश में पुनर्वापसी की तैयारी में जोर-शोर से जुटी है. सरकार

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उज्जवला योजना के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलिया में गरीबों में बांटे सिलिंडर : यूपी में डाल-डाल और पात-पात की पॉलिटिक्स तेज

पीएम ने बनारस में दिया ई-रिक्शा और ई-बोट तो अखिलेश ने लखनऊ में दिया मजदूरों को 10 रुपये में भोजन

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पत्रकार हत्या के मामले में खुल गई समाजवाद की कलई : हत्यारोपी मंत्री के बचाव में ताल ठोंक रही सरकार

मुलायम सिंह को मंत्री के कारनामे बताने के जुर्म में पार्टी से निकाले गए पूर्व विधायक देवेंद्र प्रताप सिंह कहते

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रशीद मसूद की राजनीति ख़त्म : अब इनकी बारी है

पुराने समाजवादी और अब कांगे्रसी सांसद (राज्यसभा सदस्य) रशीद मसूद आख़िरकार मेडिकल भर्ती घोटाले में सलाखों के पीछे पहुंच ही

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मुज्जफरनगर दंगों का चुनावी असर

हो सकता है मज़फ़्फ़रनगर दंगे की साज़िश राजनीतिक पार्टियों ने अपने फ़ायदे के लिए रची हो, लेकिन वहां इसके मूल

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तीसरा मोर्चा संभावनाएं और चुनौतियां

लोकसभा में एफडीआई के मुद्दे पर दो दलों ने जो किया, वह भविष्य की संभावित राजनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है. शायद पहली बार मुलायम सिंह और मायावती किसी मुद्दे पर एक सी समझ रखते हुए, एक तरह का एक्शन करते दिखाई दिए. यह मानना चाहिए कि अब यह कल्पना असंभव नहीं है कि चाहे उत्तर प्रदेश का चार साल के बाद होने वाला विधानसभा का चुनाव हो या फिर देश की लोकसभा का आने वाला चुनाव, ये दोनों साथ मिलकर भी चुनाव लड़ सकते हैं.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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सियासी दलों के मुस्लिम चेहरे

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र जहां मुलायम सिंह ने मुसलमानों की रहनुमाई का किरदार निभाने के लिए आज़म खां को आगे कर रखा है. खरी बात कहने वाले आज़म खां फायर ब्रांड मुस्लिम नेता हैं. मुलायम के साथ अधिकतर जनसभाओं में मंच पर एक साथ संगत करते हुए देखे जाते हैं.

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मुलायम सिंह का परिवार : अखिलेश-शिवपाल में ठनी रार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का यह नया चेहरा है, जहां नीतियों पर अलगाव है, टकराहट है, सत्ता हथियाने की लालसा है और पार्टी में वर्चस्व को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रहा गुस्सा है. यह अखिलेश यादव का समाजवाद है, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से बिल्कुल उलट है.

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उत्तर प्रदेश की जनता को हस्तक्षेप करना चाहिए

अखिलेश यादव के एक बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी. अखिलेश समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं और मुलायम सिंह यादव के पुत्र. डी पी यादव को पार्टी में न लेने की घोषणा ने उनकी पार्टी में भी मतभेद पैदा किए और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को कॉर्नर पर खड़ा कर दिया. आम तौर पर माना जाता है कि अगर यह फैसला मुलायम सिंह को लेना होता तो वह संभवत: डी पी यादव को पार्टी में लेने के लिए हरी झंडी दे देते, लेकिन अखिलेश यादव ने निजी तौर पर यह फैसला लिया और यह फैसला उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राय के खिला़फ लिया.

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उत्तर प्रदेश का चुनाव कई पार्टियों का भविष्य तय करेगा

अगला घमासान उत्तर प्रदेश में होने वाला है. मुख्यमंत्री मायावती राजनीतिक तौर पर सबसे आगे हैं. मायावती ने अपनी पार्टी के ऐसे सदस्यों को, जिनके प्रति स्थानीय स्तर पर आक्रोश पैदा हुआ है, बदला है और ऐसे लोगों को साथ लेने की कोशिश की है, जो उन्हें वोट दिलवा सकें. मायावती सर्वजन की भाषा बोल रही हैं. उत्तर प्रदेश में राज करने की चाबी भी इसी भाषा में है.

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मुलायम-अमर अलग क्‍यों हुए

मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलगाव की कहानी में कई तत्व हैं. अविश्वास है, ग़लतफहमी है, जलन है, आकांक्षा है, महत्वाकांक्षा है, षड्‌यंत्र हैं, दु:ख है, दर्द है और बेबसी है. मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलावा इस कहानी के मुख्य पात्र हैं मोहन सिंह, आज़म खान और राम गोपाल यादव. बाद में तो जैसे पूरी समाजवादी पार्टी ही इस कहानी के प्रमुख किरदार में बदल गई.

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मुस्लिम आरक्षण का भविष्य?

मुसलमानों और ईसाइयों के आरक्षण के मुद्दे पर हर पार्टी में भ्रम की स्थिति है. इसमें कई पेंच हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्हें आरक्षण किस कोटे से दिया जाएगा?

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लोकसभा और राज्यसभा में इतना अंतर्विरोध क्यों

बीस साल से सदन में किसी ने यह नज़ारा नहीं देखा था कि सांसद अपनी मांग पर ज़ोर देने के लिए हवा में अख़बार लहरा रहे हों. प्रधानमंत्री नज़ाकत समझ गए और उन्होंने उठकर आश्वासन दिया कि रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट सदन में इसी सत्र में पेश कर दी जाएगी.

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चौथी दुनिया की जंग जारी

मुलायम सिंह और अमर सिंह ने सामने टेबल पर पड़े कुछ अख़बारों को उठाया और उन्हें न्यूज़ चैनल के कैमरों के सामनेकर दिया. वह अख़बार था चौथी दुनिया और ख़बर थी रंगनाथ मिश्र कमीशन की.

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राज्यसभा में चौथी दुनिया

आठ दिसंबर, 2009 की सुबह. राज्यसभा के माहौल में एक अनकही सी कसमसाहट दिख रही है. सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अली अंसारी के कक्ष में बैठे कुछ सांसदों में बेचैनी का आलम है. उनके हाथों में साप्ताहिक हिंदी अख़बार चौथी दुनिया की वे प्रतियां हैं, जिसमें अख़बार के प्रमुख संपादक संतोष भारतीय ने राज्यसभा के सांसदों के लिए नाकारा, कमज़ोर और नपुंसक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है. चूंकि राज्यसभा सांसद अपनी पुरज़ोर कोशिशों के बावज़ूद दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को आरक्षण देने संबंधी अनुशंसाओं वाली रिपोर्ट को राज्यसभा में पेश नहीं करा सके, लिहाज़ा संतोष भारतीय ने सांसदों को इन विशेष शब्दों से विभूषित कर दिया.

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वे आठ मिनट जिन्‍होंने इतिहास रचा-संसद में चौथी दुनिया

राज्यसभा के सांसदों ने सात दिसंबर को नोटिस सभापति को दिया, आठ दिसंबर को उसे सदन में रखा, जिसपर सभापति ने संतोष भारतीय और चौथी दुनिया को नोटिस भेजने का निर्देश दिया. दूसरी ओर नौ दिसंबर को ही लोकसभा में मुलायम सिंह के हस्तक्षेप के बाद प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट को लोकसभा में इसी सत्र में रखने का आश्वासन दिया.

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राजबब्बर के जज्बे की जीत

राजबब्बर फिरोज़ाबाद लोकसभा का उपचुनाव जीत गए, जीते भी शानदार तरीक़े से. मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव यहां जितने वोटों से जीते थे, राजबब्बर उससे 25 हज़ार वोट ज़्यादा ले गए. अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, जिन्हें मुलायम सिंह ने अपने परिवार का प्रतीक बनाकर चुनाव में उम्मीदवार बनाया था, हार गईं. दरअसल चुनाव तो ख़ुद मुलायम सिंह लड़ रहे थे और एक बड़े ख़तरे से वे बाल-बाल बचे. तीसरे नंबर पर रहे बसपा के एस पी सिंह बघेल को अगर पंद्रह हज़ार वोट और मिल जाते तो मुलायम सिंह का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर चला जाता.
सभी जानना चाहते हैं कि यह कमाल कैसे हो गया, क्योंकि अभी कुछ महीनों पहले हुए लोकसभा चुनाव में राजबब्बर फतेहपुर सीकरी से हार चुके थे. उनकी हार में मुलायम सिंह और अजीत सिंह का सबसे बड़ा योगदान था.

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राजनीतिक दलों के भटकाव की वजह

हार वह दूरी है, जो नींद के पहले सुनी जाने वाली कहानी से शुरू होकर सुबह उठने के अलार्म पर ख़त्म होती है. जहां यह कहानी एक समय की बात है. से शुरू होती है और धीरे-धीरे कहानी सुनने वाला नींद की आगोश में आ जाता है, वहीं वह अलार्म एक नई सुबह की शुरुआत करता है. तीन राजनीतिक पार्टियां अपनी ही सफलता का शिकार हो चुकी हैं. इनके मुद्दों की मियाद पूरी हो गई है और अब वे अपने लिए मुद्दे खोज पाने में भी असक्षम हैं.

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