सीवर सफाईकर्मी : पेट की खातिर मौत से पंजा लड़ाने की मजबूरी

सीचिपियाना (ग़ाज़ियाबाद) निवासी फुट सिंह वाल्मीकि ऐसे पिता हैं, जिनके पांच जवान बेटों की मौत सीवर की स़फाई करते समय हो गई. सबकी उम्र 20 से 35 वर्ष के बीच थी. फुट सिंह की पांच विधवा बहुए हैं. इसी तरह 40 वर्षीय तारी़फ सिंह सीवर स़फाई का काम करते थे. वह घर से काम पर निकले थे. शाम को घर पर खबर आई कि तारी़फ सिंह की काम के दौरान हालत बिगड़ गई है, वह अस्पताल में हैं.

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राजस्‍थान में मौत का पुल

न जांच, न कोई बातचीत सबसे पहले क्लीनचिट. लगता है सरकार ने ग़रीबों की लाशों पर भी निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीति बना ली है. जब भी विवाद अमीर और ग़रीब के बीच का होता है, तो पूरी सत्ता अमीर के साथ खड़ी हो जाती है. ग़रीब मरते हैं तो सरकार को अ़फसोस नहीं होता. उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता. एक निर्माणाधीन पुल ताश के पत्तों की तरह गिर जाता है. सौ से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं. जांच का आदेश दे दिया जाता है, लेकिन जांच रिपोर्ट आने से पहले ही पुल बनाने वाली कंपनियों को देश के आलाधिकारी क्लीन चिट दे देते हैं.

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लापरवाही, मनमानी और भ्रष्‍टाचार का गढ़

साढ़े पांच दशक पूर्व कई लोक कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर स्थापित किया गया भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आज लापरवाही, मनमानी

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अधर में लटकी जलाशय परियोजना

देवघर ज़िले में चल रही दो बड़ी बहुप्रतीक्षित एवं बहुचर्चित जलाशय परियोजना का निर्माण कार्य अनियमितता, भ्रष्टाचार, लापरवाही एवं राजनीतिक दावपेंच के चंगुल में फंस कर रह गया है. दोनों ही जलाशय परियोजनाओं पर अब तक अरबों रुपये ख़र्च किए जा चुके हैं. फिर भी निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हुआ है.

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नौकरशाहों की लोकतंत्र में आस्था नहीं

देश के आला अफसरों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. नौकरशाह मनमाने ढंग से प्रशासन चलाना चाहते हैं और चला भी रहे हैं. संवैधानिक बाध्यता के कारण विधानसभा एवं मंत्री परिषद आदि संस्थाओं की कार्यवाही में वे औपचारिकता ही पूरी करते हैं.

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