आधुनिकता से डरते हैं आतंकी

कट्टर इस्लाम स्वतंत्रता के लिए हर जगह ख़तरा बन गया है. यह इस्लामिक समाज को बर्बाद कर रहा है, जिसे

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आज़ाद देश के गुलाम क़ानून कब खत्म होंगे

क्या आप इंडिया ट्रेजर ट्रोव एक्ट-1878 के बारे में जानते हैं? इस क़ानून के मुताबिक, अगर किसी को सड़क पर 10

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जनता परिवार प्रभावी विपक्ष और विकल्प बन सकता है

आख़िरकार, इस सरकार को आए छह महीने बीत चुके हैं. भाजपा ने चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, जैसे

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अलागिरी के अलगाव की वजह

दक्षिण भारतीय राजनीति एक बार फिर चर्चा में है. द्रविण मुनेत्र कषगम के प्रमुख एम करुणानिधि ने अपने बेटे एमके

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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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बिल्ली बनी मौत की वजह

जब किसी का कोई प्रिय शख्स मर जाता है तो मारे दु:ख के वह पागल सा हो जाता है, कभी-कभी उसकी मौत तक हो जाती है. इसी तरह कई लोग पालतू जानवरों से इतना प्यार करते हैं कि उनकी मौत के सदमे को सहन नहीं कर पाते. पिछले दिनों ब्रिटेन में अपनी पालतू बिल्ली की मौत से दु:खी एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली.

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हमारे सांसदों को इतनी इज़्ज़त क्यों चाहिए

बीते एक मई को द डेली मेल के एक पत्रकार क्वेनटीन लेट्‌स ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस के स्पीकर के बारे में एक टिप्पणी की. उन्होंने स्पीकर बेरकाऊ की तुलना एक कार्टून करेक्टर मटले से की, जो हमेशा कंफ्यूज्ड रहता था, जिसके कारण वह कभी सफल नहीं हो पाता था. इसी तरह कुछ साल पहले मैथ्यू पेरिस ने द टाइम्स में पार्लियामेंट्री स्केच नामक कॉलम शुरू किया था.

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Abhishek Manu Singhvi Sex Scandal Inside Story

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भारतीय सेना को बदनाम करने की साजिश का पर्दाफाश

बीते चार अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर पूरे पन्ने की रिपोर्ट छपी, जिसमें देश को बताया गया कि 16 जनवरी को भारतीय सेना ने विद्रोह करने की तैयारी कर ली थी. इस रिपोर्ट से लगा कि भारतीय सेना देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर फौजी तानाशाही लाना चाहती है. इस रिपोर्ट ने सारे देश में न केवल हलचल पैदा की, बल्कि सेना को लेकर शंका का वातावरण भी पैदा कर दिया. सभी चैनलों पर यह खबर चलने लगी, लेकिन तीन घंटे बीतते-बीतते सा़फ हो गया कि यह रिपोर्ट झूठी है, बकवास है, किसी खास नापाक इरादे से छापी गई है और इसे छपवाने के पीछे एक बड़ा गैंग है, जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को पसंद नहीं करता.

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मानदेय का अर्थशास्त्र नहीं बदला

बात नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. उस व़क्त मैं अपने शहर जमालपुर से दिल्ली आया था. अख़बारों में लिखना-पढ़ना तो अपने शहर से ही शुरू कर चुका था. लिहाज़ा दिल्ली आने के बाद जब बोरिया-बिस्तर लगा और पढ़ाई शुरू हुई तो उसके साथ-साथ अख़बारों के दफ्तर में इस उम्मीद में चक्कर काटने लगा कि कोई असाइनमेंट मिले, ताकि घर से मिलने वाले पैसों के अलावा कुछ और पैसों का इंतज़ाम हो सके.

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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2011: उल्लेखनीय कृति का रहा इंतज़ार

वर्ष 2011 ख़त्म हो गया. देश के विभिन्न समाचारपत्र-पत्रिकाओं में पिछले वर्ष प्रकाशित किताबों का लेखा-जोखा छपा. पत्र-पत्रिकाओं में जिस तरह के सर्वे छपे, उससे हिंदी प्रकाशन की बेहद संजीदा तस्वीर सामने आई. एक अनुमान के मुताबिक़, तक़रीबन डेढ़ से दो हज़ार किताबों का प्रकाशन पिछले साल भर में हुआ.

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पाठकों तक किताबों का पहुंचना ज़रूरी

हिंदी में जब मैंने पुस्तकों की समीक्षा लिखने का काम शुरू किया था तो समीक्षा के लिए किताबें अख़बारों से या लघु पत्रिकाओं से मिला करती थीं. जिस अख़बार या पत्रिका से समीक्षा लिखने का हुक्म जारी होता था तो वहां से पुस्तकें भेजी जाती थीं या फिर अगर दफ्तर जाता था तो वहां से ही किताबें दे दी जाती थीं.

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समाचारपत्रों की विकृति

आज के युग में स्कूलों के सिवाय मानव मस्तिष्क पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है समाचारपत्रों का. आपने ग़ौर किया होगा कि भारत में जितने भी समाचारपत्र पढ़े जाते हैं, शहरों में, देहातों में या गांवों में, उनमें से 80-90 फीसदी वे समाचारपत्र हैं, जिनके मालिक करोड़पति हैं

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ब्रिटेन, रुपर्ट मार्डोक और डेविड कैमरुन

ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन से जब पूछा गया कि आपको अपने कार्यकाल में सर्वाधिक भय किस बात का होता था तो उन्होंने उत्तर दिया कि घटनाओं से उन्हें सबसे अधिक भय लगता था. प्रधानमंत्री के रूप में उनके नौवें उत्तराधिकारी डेविड कैमरून भी इस बात से सहमत होंगे. अभी ब्रिटेन को जिस घटना ने सबसे अधिक परेशान किया है, उसकी शुरुआत रूपर्ट मार्डोक प्रकरण से नहीं हुई, बल्कि उसकी शुरुआत हुई मिली डाउलर की हत्या के मुक़दमे की जांच और उसके बाद उसके परिवार वालों को हुई परेशानी से.

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए

राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए. पिछले एक महीने की घटी घटनाएं तो यही कह रही हैं. अब वह राजनीतिज्ञ चाहे समाजवादी पार्टी का हो, भारतीय जनता पार्टी का हो या फिर वह कांग्रेस का हो. राजनीतिज्ञ कब क्या करे, कैसे करे, इसके उदाहरण पिछले एक महीने में हमारे सामने बहुत ही खुलेपन के साथ आए हैं.

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खबरों के समंदर में नई लहर

उत्तर प्रदेश में जब भी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की बात आती है तो ज़ेहन में सबसे पहले बुदेलखंड का नाम आता है. बुंदेलखंड के ज़्यादातर इलाक़े भुखमरी और सूखे का सालों से सामना करते आ रहे हैं. इस वजह से ही यह इलाक़ा विकास की रफ्तार में सबसे पीछे छूट गया है.

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मेरे खिलाफ लिखना मना है

सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है. हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमज़ोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है.

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