देश इस पहेली का उत्तर जानना चाहता है

मुझे किसी मित्र ने सवाल भेजा है, सवाल क्या, बल्कि पहेली भेजी है. मैं इस पहेली का उत्तर नहीं तलाश

Read more

प्रचार नहीं, लोगों का सपना पूरा कीजिए

मोदी सरकार के दो साल पूरे हो गए. दो साल पूरे होने पर जश्न मनाना एक परंपरा भी है और

Read more

शत्रु संपदा क़ानून में पिस रहे बांग्लादेशी हिंदू

बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसं‘यक समुदाय, खासकर हिंदुओं की जान-माल की सुरक्षा से संबंधित खबरें भारतीय मीडिया की सुर्खियों में

Read more

विशेष पैकेज में कई झोल हैं

बिहार विधानसभा चुनाव की बाजी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी (एनडीए) के पक्ष में सबसे बड़ा दांव खेल

Read more

सरेया अख्तियार की सूनी गलियां बिहार के हर गांव की यही कहानी है

  बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मीडिया में भले ही तूफान मचा हो, रेडियो और अख़बारों में अंधाधुंध प्रचार हो

Read more

बाज़ारवादी पत्रकारिता के निशाने पर वैदिक

पत्रकारिता के बारे में आम तौर पर धारणा है कि पत्रकार निष्पक्ष तो होता ही है, क्योंकि उसे जज या

Read more

जरा हट के : कुत्ते ने हासिल की एमबीए की डिग्री

हो सकता है आने वाले दिनों में प्राइवेट कंपनियों में एमबीए होल्डर कुत्तों की मांग आने लगे. कुत्ते की जितनी बड़ी

Read more

सांप्रदायिकता के विरोध की दिशा तय करनी होगी

सांप्रदायिकता निरपेक्ष शब्द नहीं है, सापेक्ष शब्द है. सांप्रदायिकता अमूर्त नहीं है, मूर्त है. सांप्रदायिकता को पारिभाषित करना आवश्यक है.

Read more

Kota Chambal Bridge – Maut ka Pul

Read more

Black Sheep of Indian Journalism Exposed

Read more

हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.

Read more

कमज़ोर संस्मरण, ढीला संपादन

लम्बे समय तक कई अंग्रेजी अख़बारों के संपादक रहे एस निहाल सिंह ने अपनी संस्मरणात्मक आत्मकथा इंक इन माई वेन-अ लाइफ इन जर्नलिज्म में देश पर इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गई इमरजेंसी पर लिखते हुए जय प्रकाश नारायण को रिलक्टेंट रिवोल्यूशनरी (अनिच्छुक क्रांतिकारी) कहा है. एक लेखक को शब्दों के चयन में सावधान रहना चाहिए और अगर वह दो दशकों से ज़्यादा समय तक संपादक रहा है तो यह अपेक्षा और बढ़ जाती है.

Read more

पत्रकारिता की क़ीमत जान हो सकती है

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसकी क़ीमत क्या है, अभी यह तय नहीं हुआ है. पत्रकारिता में जो लोग आते हैं उन्हें कम से कम यह ध्यान में रखकर आना चाहिए कि पत्रकारिता के पेशे की क़ीमत उनकी अपनी जान हो सकती है. मुंबई में मिड डे के पत्रकार जेडे की हत्या इस सत्य को एक बार फिर रेखांकित कर रही है.

Read more

अदब के लिए फुर्सत के लम्‍हे निकल आते हैं

महमूद शाम पाकिस्तान के प्रसिद्ध पत्रकार हैं. वह लगभग 48 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. पाकिस्तान के जंग समाचारपत्र के समूह संपादक की हैसियत से उन्होंने काफ़ी चर्चा हासिल की. वह पाकिस्तान के नवाए वक़्त, अख़बार-ए-जहां, मसावात एवं मियार जैसे बड़े समाचारपत्रों से भी जुड़े रहे.

Read more

पति को बेचने का विज्ञापन

यक़ीन नहीं होता, लेकिन बात सौ फीसदी सच है. एक महिला ने अपने पति से आजिज आकर उसे बेचने का फैसला किया है. उसने बाकायदा विज्ञापन भी दे दिया है. अब देखने वाली बात यह है कि उसे ख़रीदार कब मिलता है. वे जमाने लद गए, जब महिलाएं चाहरदीवारी में कैद रहती थीं. अब तो वे घर की ड्योढ़ी लांघ कर देश-दुनिया चला रही हैं.

Read more