यूएस ने 35 रूसी डिप्लोमैट्स को दिया देश छोड़ने का आदेश, साइबर हैकिंग का आरोप

अमेरिका ने 35 रूसी डिप्लोमैट्स को यूएस छोड़ने का आदेश दिया है, साथ ही 2 रूसी इंटेलिजेंस एजेंसीज जीआरयू और

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लोकतंत्र के लिए लडा़ई खुद लड़नी चाहिए

हम लोग या हिंदुस्तान के लोग भूल गए हैं कि पश्चिम एशिया में, लीबिया में लड़ाई चल रही है. यमन में जनता सड़कों पर है. सीरिया में लोग बशर अराफात का विरोध कर रहे हैं और साथ ही साथ जहां से यह कहानी शुरू हुई थी यानी मिस्र, वहां भी तहरीर चौक पर लोग डटे हुए हैं और उनका कहना है कि सेना को सत्ता छोड़नी चाहिए और चुनाव कराने चाहिए.

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रेमंड को माफी अवाम को मंजूर नहीं

अमेरिकी दूतावास कर्मी रेमंड डेविस की गोली से जब दो पाकिस्तानी नागरिक मारे गए थे तो कट्टरपंथियों ने यह कहते हुए चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था कि यदि अमेरिका के दबाव में रेमंड की रिहाई हुई तो मुल्क में हुकूमत के विरुद्ध आग भड़क उठेगी, लेकिन रेमंड इस्लामी शरीयत के मुताबिक़ ब्लड मनी देकर रिहा हो गया.

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क्या पाकिस्तान बदलाव के लिए तैयार है?

अमेरिकी विदेश मंत्रालय में तीन सौ से ज़्यादा विदेशी पाकिस्तानियों के साथ खड़े मेरे जेहन में कुछ ऐसे ही ख्याल आ रहे थे. अमेरिका-पाकिस्तान के बीच हुई रणनीतिक बैठक के दौरान एक समारोह में सारे लोग एकत्र हुए थे. पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारी बातचीत के माहौल से खासे उत्साहित थे.

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अमेरिका और चीन एक-दूसरे की ज़रूरत हैं

हाल में अमेरिका और चीन के संबंधों में का़फी उथल-पुथल देखने को मिली. इसके बावजूद दोनों देशों के पास एक-दूसरे को सहयोग करने की बेहद ठोस वजह है. यह घटनाक्रम पिछले दो दशकों में विकसित हुआ है. इस बात को दोनों मुल्क स्वीकार करते नज़र आ रहे हैं. ओबामा प्रशासन द्वारा ताइवान को हथियार बेचने के फैसले पर चीन ने उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन उसकी अधिकांश प्रतिक्रिया सांकेतिक ही रही है.

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अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान और अमेरिका

इससे ज़्यादा स्पष्ट और कुछ नहीं हो सकता है कि अ़फग़ानिस्तान में मौजूद विदेशी सेनाओं के अपने-अपने हितों और परिस्थितियों के बीच एक चौड़ी खाई है. हालांकि अमेरिकी अधिकारी कह चुके हैं कि अ़फग़ानिस्तान से सेना को हटाने के बारे में ओबामा प्रशासन द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाना अभी बाक़ी है.

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क्‍या भारत को हॉलब्रूक की जरूरत है?

अफग़ानिस्तान और पाकिस्तान में तैनात अमेरिकी दूत रिचर्ड हॉलब्रूक अ़फग़ानिस्तान-पाकिस्तान नीति में अमेरिका की जीत के लिए भारत को फ़ायदेमंद मानते हैं. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है, जब रिचर्ड हॉलब्रूक ने अ़फग़ानिस्तान-पाकिस्तान नीति में भारत को शामिल किए जाने की पेशकश की है. अपने इस बयान से भले ही उन्होंने सीधा इशारा नहीं किया है, लेकिन इतना ज़रूर सा़फ कर दिया है कि अमेरिका अ़फग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हर हालात में जीतना चाहता है और इस जीत के लिए उसे अगर भारत का सहारा लेना पड़ता है तो वह ज़रूर लेगा. हॉलब्रूक का यह बयान ऐसे व़क्‍त में आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री अ़फग़ानिस्तान पर आयोजित एक समिट के लिए लंदन रवाना हो रहे थे. इस समिट का आयोजन ब्रिटेन, संयुक्‍त राष्‍ट्र और अ़फग़ानिस्तान की पहल पर हुआ. इसमें दुनिया भर के देशों के विदेश मंत्री इस बात पर चर्चा करेंगे कि किस तरह से अ़फग़ानिस्तान में सैन्‍य और ग़ैर सैनिक संसाधनों का प्रयोग किया जाए और अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर अ़फग़ानिस्तान की समस्‍या से निपटने के लिए नीति बनाई जाए.

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नई विश्व व्यवस्था और बदलता नज़रिया

जब किसी वर्ष के साथ दशक का अंत होता हो तो एक स्तंभकार की ज़िम्मेदारियां का़फी बढ़ जाती हैं. इनमें अधिकांश एक स्मृति लेख की तरह उबाऊ होते हैं, लेकिन किसी के ज़ेहन में एक असामान्य सवाल आया कि पिछले दस वर्षों में किसी चीज़ के बारे में आपने अपना विचार बदला?

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खबरदार आतंकवाद

मनमोहन भाई, मैं आतंकवाद हूं मैं तुमको पीटने आया हूं.
खबरदार ऐसी बेवकूफी मत करना. मैं बहुत ताकतवर हूं. बच नहीं पाओगे.
तडाक……
मैं तुमसे अनुरोध करता जा रहा हूं और तुम हो कि मुझे पीटते जा रहे हो. मैं बहुत बलिष्ठ हूं. इसलिए हे मूर्ख. कायर, अपनी उदंडता और घृष्टता तुरंत बन्द कर दो वरना……
घडाम।।
तुमने मुझे फिर पीटा।। बस एनफ इज एनफ. मेरे सब्र की सीमा समाप्त हो गई. अब मैं वो करूंगा जो तुम सोच भी नहीं सकते. देखो मैं क्या करने जा रहा हूं.
ओबामा।।

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भारत को मिली नई चुनौती

यहां एक बात ग़ौर करने वाली है कि भारत का शुरू से ही कहना रहा है कि एनपीटी एक पक्षपातपूर्ण संधि है. भारत उन पहले देशों में से है जो परमाणु अप्रसार के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि की मांग कर रहा है. लेकिन जैसे ही यह साबित हुआ कि परमाणु अप्रसार के ज़रिए परमाणु हथियारों वाले देश यह शक्ति महज़ अपने तक सीमित रखने की फिराक में हैं, ताकि इसकी मदद से वे दूसरे देशों को यह दर्ज़ा हासिल करने से रोक सकें और ख़ुद परमाणु हथियारों के भंडार में वृद्धि करते रहें, भारत ने इस संधि को स्वीकारने से मना कर दिया.

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