लोकपाल की नियुक्ति में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई केंद्र को फटकार

केंद्र सरकार को एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के कड़े सवालों का सामना करना पड़ा है. लोकपाल की नियुक्ति

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देश को विजेता का इंतजार है

अगस्त का महीना भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण रहा. सरकार, विपक्ष, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस महीने के मुख्य पात्र थे. एक पांचवां पात्र भी था, जिसका ज़िक्र हम बाद में करेंगे. इन चार पात्रों ने अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. सरकार और विपक्ष ने अपनी पीठ ठोंकी, दूसरी ओर अन्ना और रामदेव ने अपने आंदोलन को सफल कहा. हक़ीक़त यह है कि ये चारों ही न हारे हैं, न जीते हैं, बल्कि एक अंधेरी भूलभुलैया में घुस गए हैं.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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पत्रकार की नज़र में आंदोलन

काफी लंबे समय के बाद भारतीय समाज में एक ऐसा आंदोलन देखने को मिला, जिसके समर्थन में जनता स्वत:स्फूर्त तरीक़े से सामने आई. जनता के समर्थन से होने वाले इस आंदोलन ने सरकार की नींद उड़ा दी. अगर हम भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डालते हैं तो जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के बाद यह पहला बड़ा आंदोलन था, जिसे देशव्यापी जनसमर्थन मिला.

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लोक स्‍वराजः टीम अन्‍ना का नया आंदोलन

समय सीमा 2014. इससे पहले टीम अन्ना एक नया आंदोलन शुरू करेगी, नाम होगा लोक स्वराज. काग़ज़ी तैयारी हो चुकी है, ज़मीनी तैयारी भी लगभग शुरू हो गई है. इंतज़ार है तो स़िर्फ विधानसभा चुनाव ख़त्म होने का. इसके बाद फिर एक बिल आएगा. फिर से आंदोलन होगा. फिर से एक मांग होगी. आख़िर क्या है नया मुद्दा, कैसे शुरू होगा नया आंदोलन और क्या है एजेंडा? पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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लोकपाल के नाम पर धोखाः कहां गया संसद का सेंस ऑफ हाउस

इस बार दिल्ली की जगह मुंबई में अन्ना का अनशन होगा. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से गिरफ्तारियां दी जाएंगी. इसकी घोषणा टीम अन्ना ने कर दी है. आख़िरकार, वही हुआ, जिसकी आशंका चौथी दुनिया लगातार ज़ाहिर कर रहा था. अगस्त का अनशन ख़त्म होते ही चौथी दुनिया ने बताया था कि देश की जनता के साथ धोखा हुआ है.

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यूआईडीः नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ खिलवाड़

जब लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे का एक दिवसीय अनशन शुरू हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जनलोकपाल बिल पर बहस करने की दावत दी, लेकिन सांसदों ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि इस बिल पर चर्चा करने का अधिकार केवल संसद को है, सड़क पर चर्चा नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार और हमारे नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में जारी आधार स्कीम पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे ख़ारिज करके सरकार से उस पर दोबारा ग़ौर करने के लिए कहा है तो फिर क्यों अभी तक यह कार्ड बनने का सिलसिला जारी है.

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नई संसद लोकपाल बिल पास करे

एक बार फिर लोकपाल विधेयक को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. मानों यह एक पहेली बन गया हो. पहले सरकार को खुदरा बाज़ार में एफडीआई पर पीछे लौटना पड़ा और अब लगता है कि उसे पेंशन और कंपनी बिल के मामलों में भी ऐसा ही करना पड़ेगा. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ख़ुद अपने ही निर्णय में उलझ गई हो, कैद हो गई हो.

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व़क्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

अक्सर यह माना जाता है कि नियम बनाए जाते हैं और बनाते समय ही उसे तोड़ने के रास्ते भी बन जाते हैं. क़ानून बनाए जाते हैं और उनसे बचने का रास्ता भी उन्हीं में छोड़ दिया जाता है तथा इसी का सहारा लेकर अदालतों में वकील अपने मुल्जिम को छुड़ा ले जाते हैं. शायद इसीलिए बहुत सारे मामलों में देखा गया है कि अपराधी बाहर घूमते हैं, जबकि बेगुनाह अंदर होते हैं.

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राहुल जी, यह वक्‍त बहुत महत्‍वपूर्ण है

अन्ना हजारे का आंदोलन सारे देश की चेतना को उभार रहा था. गली-गली, मैदान-मैदान, हर जगह आंदोलन हो रहे थे. ऐसे समय में संसद के ऊपर ज़िम्मेदारी थी कि वह कोई हल निकाले, लेकिन संसद अन्ना हजारे के आंदोलन के खिला़फ खड़ी नज़र आई. उस समय यह ज़रूर लग रहा था कि अगर सोनिया गांधी यहां होतीं तो वह शायद कोई हल निकालने में पहल कर पातीं.

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उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है

एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया.

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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार

एक दशक पहले यह खतरा पहचान में आने लगा था कि अगर नव उदारवादी नीतियों के मुक़ाबले में खड़े होने वाले जनांदोलनों का राजनीतिकरण और समन्वयीकरण नहीं हुआ तो नव उदारवाद के दलाल, चाहे वे नेता हों, नौकरशाह हों, बुद्धिजीवी हों, एनजीओबाज हों, धर्मगुरु हों, कलाकार हों या खिलाड़ी, विरोध के सारे प्रयास नाकाम कर देंगे. वही हो रहा है.

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सरकार पारदर्शिता की पक्षधर नहीं है

मामला चाहे लोकपाल का हो या फिर काले धन का, दरअसल इन सबके पीछे असल मुद्दा सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही का है. आज भ्रष्टाचार को लेकर देश में जो माहौल बना है, उसमें सीबीआई सहित सभी जांच एजेंसियों में सुधार की ज़रूरत है. सरकार उल्टा सोचती है. सीबीआई को पारदर्शी बनाने की जगह उसे आरटीआई के दायरे से ही बाहर कर दिया गया.

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अब लोकपाल नहीं बनेगा

हमारे देश में सरकारी तंत्र के साथ साथ भ्रष्टाचार का तंत्र भी मौजूद है. यह भ्रष्ट तंत्र देश की जनता को तो नज़र आता है, लेकिन सरकार अंधी हो चुकी है. इसलिए सरकारी तंत्र और भ्रष्ट तंत्र दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं. ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए तो सरकार के नियम क़ानून हैं, जिसके ज़रिए आपको लाइसेंस नहीं मिल सकता.

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भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था को उड़ा ले जाएगी अन्‍ना की आंधी

देश भर में अन्ना हजारे की जय जयकार, भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन की गूंज, शहरी युवाओं का सड़कों पर उतरना और कैंडिल मार्च, यह सब एक नई राजनीति की शुरुआत के संकेत हैं. भारत की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष के मायने बदल गए हैं. सत्तापक्ष में कांग्रेस पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी है और उसके विरोध में देश की जनता खड़ी है. मतलब यह कि एक तऱफ देश चलाने वाले लोग हैं और दूसरी तऱफ देश की जनता है.

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सरकारी लोकपाल बनाम जन लोकपाल

आखिर क्या है जन लोकपाल? क्यों सरकार जन लोकपाल को लेकर परेशान है? असल में जन लोकपाल बिल एक ऐसा क़ानून है, जो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए किसी ताबूत से कम नहीं साबित होगा. पिछले 42 सालों में यह विधेयक कई बार क़ानून बनते-बनते नहीं बन पाया. यूपीए सरकार ने बिल का मसौदा तैयार तो किया, लेकिन सिविल सोसायटी के लोग और अब तो आम आदमी भी बिल के प्रावधानों से खुश नहीं है.

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जनता जाग चुकी हैः गलती स्‍वीकारने का नहीं, सुधारने का वक्‍त

बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ न्यूज़ चैनलों के संपादकों से मिले, बाक़ायदा एक प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिए. बहुत सी बातें हुईं. पहले प्रधानमंत्री के कुछ चुनिंदा बयानों पर ऩजर दौड़ाएं.

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लोकपाल विधेयकः भ्रष्‍टाचार के खिलाफ कमजोर सरकारी हथियार

एक मंत्री की वजह से देश की जनता को एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपये का चूना लग जाता है और वही जनता अगर उस भ्रष्ट मंत्री के ख़िला़फ आवाज़ उठाए तो बहुत संभव है कि उसे देशद्रोही बताकर सलाखों के पीछे कैद कर दिया जाए. यह भी संभव है कि उक्त भ्रष्ट मंत्री को अपने किए की कोई सज़ा भी न मिले.

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