चुनाव आया तो विकास में सहयोग के लिए अखिलेश ने लिखा सांसदों को पत्र : चतुर चिंता की चिट्ठी

उत्तर प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव सामने है तब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव में विकास के प्रति अतिरिक्त चिंता जाग्रत होने

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कैम्पा क़ानून : आदिवासियों को जंगल से बेद़खल करने का वारंट है

ओड़ीशा के कंधमाल ज़िले के जंगलों में बसा एक छोटा सा गांव है बुलुबरू. यहां के निवासी अपना पेट भरने

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ओड़ीशा : 1 गांव, 100 दिन, 19 बच्चों की मौत : भूख और कुपोषण से त्रस्त हैं जनजातीय समूह

ओडीशा के जाजपुर जिले का एक ब्लॉक है सुकिंदा. इसी ब्लॉक के तहत आता है नगडा गांव. इस गांव में

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ओड़ीशा :नियमगिरि में बॉक्साइट युद्ध : जनता का संघर्ष जारी है

ओड़ीशा माइनिंग कॉर्पोरेशन (ओएमसी) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके नियमगिरि में फिर से ग्रामसभा बुलाने की मांग

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सरकार सूखे को राष्ट्रीय समस्या घोषित कर निदान करे

अभी-अभी जब मैं संपादकीय लिखने बैठा हूं तो खबर आई कि पंजाब में चार किसानों ने आत्महत्या कर ली है.

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झारखंड पुलिस की विशेष शाखा ने किया खुलासा : धन कमाने में लगे हैं नक्सली

बन्दूक की नली से सत्ता की राह निकालने की बात करने वाले नक्सली अब अपने तमाम सिद्धांतों को दरकिनार कर

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चलते-फिरते आयुध कारखाने बारूद और हथियार के कारीगर मांग रहे रोज़गार

दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले एक महीने से आयुध कारखाने (ऑर्डिनेंस फैक्ट्री) के हज़ारों पूर्व शिक्षु अप्रेंटिस (संशोधन) एक्ट-1961 की

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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दिल्ली का बाबू : उड़ीसा सरकार की विभेदकारी नीति

हाल में हुए हाउसिंग घोटाले में नेताओं और बाबुओं का नाम आना उड़ीसा सरकार के लिए चिंता का कारण बना हुआ है, लेकिन यह तो मात्र एक उदाहरण है, क्योंकि ऐसा अन्य राज्यों में भी हो रहा है. इस समय उड़ीसा के मुख्यमंत्री किसी अन्य कारण से परेशानी में हैं.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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बाघों के लिए बुरी खबर है

इस बार सुंदरवन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाक़ों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है, जो पिछली बार शामिल नहीं थे. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट उन इलाक़ों से नहीं आई है, जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है.

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गोदामों में सड़ता अनाज और सरकार

हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर अनाज की बर्बादी पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. गोदामों और खुले आसमान के नीचे रखे अनाज के लगातार सड़ने की घटनाओं पर सख्त रवैया अपनाते हुए अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि अनाज को सड़ने देने के बजाय बेहतर होगा कि उसे मुल्क की ग़रीब जनता में बांट दिया जाए.

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पॉस्को परियोजना: घपलेबाज़ी की अंतहीन कहानी

उड़ीसा में 54000 करोड़ के निवेश से स्टील प्लांट लगाने को प्रयासरत पॉस्को कंपनी की अनैतिक कार्रवाइयों की लिस्ट का़फी लंबी है. प्लांट के लिए फॉरेस्ट क्लियरेंस में घपलेबाज़ी की बात अभी पुरानी भी नहीं हुई थी कि एक और मामला सामने आ गया. स्थानीय लोगों के प्रतिरोध का समर्थन कर रहे सिविल सोसायटी समूहों ने यह खुलासा किया कि पॉस्को ने खनन कार्य के लिए क्लियरेंस नहीं लिया है.

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पॉस्‍को परियोजनाः विरोध और स्‍वीकृतियों का इतिहास

कई बार कुछ खास तारीखें इतिहास में अहम बनकर रह जाती हैं. 28 जुलाई, 2010 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मौजूदा दौर की सबसे ज्यादा विवादित रही औद्योगिक परियोजनाओं में से एक के प्रस्तावित स्थल पर अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य वनवासियों के फॉरेस्ट राइट्‌स एक्ट 2006 के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एक चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया.

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स्‍कूलों में बच्‍चों की सुरक्षा का सवाल

हाल में उड़ीसा विधानसभा में एक ऐसे मुद्दे को लेकर गहमागहमी बढ़ गई, जिसका सीधा संबंध ग़रीब आदिवासियों की बेबसी और लाचारी की आड़ में उनके शोषण से जुड़ा था. राज्य सरकार द्वारा संचालित जनजातीय विद्यालय, जो ग़रीब एवं पिछड़े आदिवासी छात्रों को शिक्षा का उजाला दिखाने के लिए खोले गए थे, उनके उत्पीड़न का केंद्र बन गए.

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आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन आस्था धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मध्य पड़ने वाले कुछ ऐसे भूभाग हैं जहां से नक्सलवादियों को लगातार गुज़रना पड़ता है.

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हीरे और अलेक्‍जेन्‍ड्राइट की तस्‍करी जारी

राजधानी से कुछ ही दूरी पर स्थित हीरे की खदान में पिछले लंबे समय से अवैध उत्खनन का काम धड़ल्ले से जारी है. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास खनिज विभाग का ज़िम्मा भी है, इसके बावजूद सुरक्षा तंत्र इस अवैध खुदाई को रोक पाने में असक्षम है.

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माओवादी बंदूक की नोक पर बात करना चाहते हैं

अगर माओवादी आदिवासियों का हित चाहते हैं तो उनकी बस्तियों में अमन का होना भी ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई विकास कार्य नहीं किया जा सकता. क्रॉस फायरिंग के माहौल में सड़क या पुल बनाने का काम नहीं हो सकता. माओवादी नेताओं को यह ज़मीनी हक़ीक़त समझनी होगी और सरकार को भी नई सोच के साथ आदिवासियों के कल्याण के लिए लगना होगा. माओवादी मुख में राम-बगल में छुरी वाली कहावत पर चल रहे हैं.

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दर्द से कराहती ज़िंदगी दूषित पानी से विकलांग होते ग्रामीण

यूनीसेफ की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक़ पूरे भारत वर्ष के 20 राज्य के ग्रामीण अंचलों मे रहने वाले लाखों लोग फ्लोराइड युक्त पानी के सेवन से फ्लोरोसिस के शिकार हैं. सर्वाधिक प्रभावित राज्यों मे आंध्रप्रदेश, गुजरात एवं राजस्थान है, जहां 70 से 100 प्रतिशत ज़िले फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं, जबकि बिहार, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेश में फ्लोरोसिस प्रभावित जिले 40 से 70 प्रतिशत हैं.

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सरकार कंपनियों के आगे नतमस्‍तक

छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव गदगद हैं कि बड़े उद्योग राज्य पर बहुत मेहरबान हैं और अब तक कोई चार लाख करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बने बस एक ही दशक तो पूरा हुआ है और कामयाबी का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया गया.

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बैगन पर बवाल, सेहत का सवाल

काफी दिनों से बीटी बैगन को लेकर पूरे देश में व्यापक बहस चल रही है. इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं. कहने का मतलब यह है कि बीटी बैगन सुर्ख़ियों में है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आख़िर बीटी बैगन है क्या?

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सच की जुबान पर सरकार का पहरा

केंद्र सरकार की इस बेताला धुन पर कई राज्य सरकारें जुगलबंदी कर रही हैं कि माओवादी अमन और तऱक्क़ी के जानी दुश्मन हैं, देश और समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं. यह न्याय और अधिकार की आवाज़ को कुचल देने का आसान हथियार है. विकास के नाम पर ग़रीब-वंचित आदिवासियों का सब कुछ हड़प लेने की सरकारी मंशा के ख़िला़फ जो खड़ा हो, माओवादी का ठप्पा लगाकर उस पर लाठी-गोली बरसा दो या फिर उसे जेल पहुंचा दो.

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अन्नदाता की ख़ुदकुशी का इंतज़ाम

आंकड़े बताते हैं कि 1997 से 2008 तक भारत में क़रीब सवा लाख किसान ख़ुदक़ुशी कर चुके हैं. इनमें ऊपर बताए गए राज्यों के अलावा छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब, उड़ीसा और केरल के किसान शामिल हैं. और यही वह समय भी है, जब देश में बीटी कॉटन यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों का प्रचलन ज़ोर पकड़ रहा था. सन 2002 में, जहां देश में क़रीब 27 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में बीटी कॉटन की खेती होती थी, यह दायरा 2006 में बढ़ कर 38 लाख हैक्टेयर पहुंच गया. इसी के साथ किसानों की परेशानियों का दौर भी बढ़ता चला गया।

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उड़ीसा के जन संघर्ष, उनके सबक और चुनौतियां

वर्ष 1969 में पूरे उड़ीसा राज्य में आम हड़ताल करके एक और स्टील प्लांट लगाने की सरकार से मांग की गई थी. आज उड़ीसा में देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा प्रस्तावित कारखानों, माइनिंग का व्यापक पैमाने पर विरोध किया जा रहा है. 40 साल पहले जब एक और स्टील प्लांट की मांग की जा रही थी, तब लोगों को यह लग रहा था कि इससे रोज़गार के अवसर मिलेंगे, प्लांट में हज़ारों लोगों को काम सीधे तौर पर मिलेगा, शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाओं का प्रसार होगा और श्रमिकों के कल्याण हेतु तमाम कदम उठाए जाएंगे, लेकिन आज उन्हें लग रहा है कि उन्हें उजाड़ दिया जाएगा, जो कुछ है भी, वह भी छिन जाएगा. पहाड़, वन, ज़मीन, पानी, घर-आवास, गांव-बस्ती उनसे छिन जाएगी. उन्हें अपना पूरा जीवन अंधकारमय दिख रहा है. वे विरोध करने को तथा लड़ते हुए मर जाने को तत्पर हैं.

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