राजनीति के नए सिद्धांत

भारत की राजनीति में नए सैद्धांतिक दर्शन हो रहे हैं. पता नहीं ये सैद्धांतिक दर्शन भविष्य में क्या गुल खिलाएंगे, पर इतना लगता है कि धुर राजनीतिक विरोधी भी एक साथ खड़े होने का रास्ता निकाल सकते हैं. लेकिन लोकसभा या राज्यसभा में क्या अब ऐसी ही बहसें होंगी, जैसी इस सत्र में देखने को मिली हैं. मानना चाहिए कि ऐसा ही होगा. ऐसा मानने का आधार है. दरअसल, अब इस बात की चिंता नहीं है कि हिंदुस्तान में आम जनता का हित भी महत्वपूर्ण है.

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मैरिड टू अमेरिका

अस्सी के दशक में कालचक्र और आतंक ही आतंक जैसी अंडरवर्ल्ड पर कामयाब फिल्में बनाने वाले लेखक, निर्देशक दिलीप शंकर पांच साल के लंबे अंतराल के बाद मैरिड टू अमेरिका नाम की फिल्म लेकर एक बार फिर दर्शकों के बीच हैं. रंगमंच से फिल्मों में आए दिलीप शंकर की बॉलीवुड में अंतिम फिल्म निगेहबान थी, जो साल 2007 में आई थी.

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खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश : सरकार देश को गुमराह कर रही है

खुदरा व्यापार का मतलब है कि कोई दुकानदार किसी मंडी या थोक व्यापारी के माध्यम से माल या उत्पाद खरीदता है और फिर अंतिम उपभोक्ता को छोटी मात्रा में बेचता है. खुदरा व्यापार का मतलब है कि वैसे सामानों की खरीद-बिक्री, जिन्हें हम सीधे इस्तेमाल करते हैं.

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क्या बड़े खुदरा व्यापारी भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे?

घरेलू खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में अचानक बड़े विदेशी खिलाड़ियों को आमंत्रित करने के सरकारी फैसले से विवाद का पिटारा खुल गया है. इन बड़े-बड़े खुदरा व्यापारियों (विदेशी रिटेलर्स) के नफे-नुक़सान पर एक विस्तृत चर्चा होनी चाहिए.

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पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

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दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.

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