महा तीर्थ शिरडी

साई बाबा का निवास स्थान होने और वहां ही उनका समाधि मंदिर स्थित होने के कारण शिरडी तीर्थ स्थान बन गया है. साई बाबा के समाधि मंदिर में उनकी मूर्ति का दर्शन कर नित्य हज़ारों लोग अपनी मनोकामना पूरी करते हैं. ऐसा नहीं है कि सन 1918 में साई बाबा के महासमाधि लेने और उनका समाधि मंदिर बनने के बाद शिरडी तीर्थ स्थान बना हो.

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आस्था है तो सब कुछ है

काका साहेब दीक्षित के भ्राताश्री भाई जी नागपुर में रहते थे. जब वह 1906 में हिमालय गए थे, तब उनका गंगोत्री घाटी के नीचे हरिद्वार के समीप उत्तर काशी में सोमदेव स्वामी से परिचय हो गया. दोनों ने एक दूसरे के पते लिख लिए. पांच वर्ष पश्चात सोमदेव स्वामी नागपुर आए और भाई जी के यहां ठहरे.

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बाबा का मुक्तीदान

सरदार काका साहब मिरीकर का बेटा बाला साहब मिरीकर कोपर गांव का मामलतदार था. वह दौरे पर चितली गांव जा रहा था. रास्ते में वह बाबा के दर्शन के लिए शिरडी आया. मस्जिद में जाकर उसने बाबा को साष्टांग प्रणाम किया. बाबा और बाला साहब के बीच कुशल क्षेम की और इतर बातें होती रहीं.

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बाबा की सर्वज्ञाता

यथार्थ में साई बाबा ने कभी किसी से पैसा नहीं मांगा और न ही अपने भक्तों को ही मांगने दिया. वह आध्यात्मिक उन्नति में कांचन को बाधक समझते थे और भक्तों को उसके पाश से सदैव बचाते रहते थे. भगत म्हालसापति इसके उदाहरण थे. वह बहुत निर्धन थे और बड़ी कठिनाई से अपना जीवन बिताते थे.

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बाबा की सीख

बाबा की हर महिमा के पीछे कोई न कोई शिक्षा ज़रूर छिपी होती है. ऐसी ही एक कहानी आपको सुनाते हैं. शिरडी में प्रति रविवार को बाज़ार लगता है. इसी दिन हेमाडपंत बाबा की चरण-सेवा कर रहे थे. शामा बाबा के बाईं ओर व वामनराव बाबा के दाहिनी ओर थे. इस अवसर पर बूटीसाहेब और काकसाहेब दीक्षित भी वहां उपस्थित थे. तब शामा ने हंसकर अण्णासाहेब से कहा कि देखो, तुम्हारे कोट की बांह पर कुछ चने लगे हुए-से प्रतीत होते हैं.

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हैप्पी हसबैंड्‌स

सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म हैप्पी हसबैंड्‌स कहानी है पतियों की, पति होने पर जीवन के प्रति उनके दर्शन की. शादी के बाद अपने व्यक्तिगत स्तर पर वे किन हालात का सामना करते हैं. स्लैपस्टिक कॉमेडी न होकर यह जीवन का फलस़फा है.

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आश्‍चर्यजनक दर्शन

एक दिन रात्रि में शोभा के पति को एक विचित्र स्वप्न आया. उसने देखा कि एक बड़े शहर में पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर कारावास में डाल दिया है. तत्पश्चात ही उसने देखा कि बाबा शांत मुद्रा में सीखचों के बाहर उसके समीप खड़े हैं.

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संतति दान

सपटणेकर दर्शनों के लिए आगे बढ़े ही थे कि आवाज़ आई, बाहर निकल जाओ. वह बहुत धैर्य और नम्रता धारण करके आए थे. उन्होंने सोचा कि शायद पिछले कर्मों के कारण ही बाबा मुझसे अप्रसन्न हैं.

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