अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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जनरल की जंग जारी है

जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के इतिहास के एक ऐसे सिपाही साबित हुए हैं, जिसने सेना में रहते हुए भी देश हित में भ्रष्टाचार के खिला़फ जंग लड़ी और सेना से रिटायर होने के बाद भी अपनी उस लड़ाई को जारी रखा. जनरल वी के सिंह जब तक सेना में रहे, वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे और पहली बार ऐसा हुआ कि सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के बारे में उस आम आदमी को पता चला, जिसके पैसों की खुली लूट सेना में मची हुई थी तथा अभी भी जारी है.

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बिहारः सेवा यात्रा में सुशासन की पोल खुली

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चार दिवसीय चंपारण सेवा यात्रा ने सुशासन की पोल खोल दी है. मुख्यमंत्री के मोतिहारी पहुंचते ही पंचायत शिक्षकों द्वारा मानदेय भुगतान के लिए किया गया हंगामा, पुतला दहन, बिजली का ग़ायब होना, पंचायती राज के जन प्रतिनिधियों का आंदोलन एवं अभियंत्रण महाविद्यालय में व्याप्त कुव्यवस्था को लेकर छात्रों का हंगामा तथा सभाओं में जनता के बीच उत्साह न होना साबित करता है कि लोग सरकार से खुश नहीं हैं.

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सिर्फ नोएडा नहीं पूरे देश में किसान हिंसक हो सकते हैं

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की नीतियां कुछ और हैं और राहुल गांधी कुछ और बात करते हैं. सरकार भूमि अधिग्रहण से संबंधित वर्षों पुराने कानून में संशोधन की दिशा में कोई कदम नहीं उठाती और राहुल गांधी उसी कानून के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं, लेकिन सिर्फ वहीं, जहां गैर कांग्रेसी दलों की सरकार है.

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सूचना मांगी तो जेल भेजा

महनार में भाजपा कार्यकर्ता सुबोध राय ने अवर निबंधक की लेट लती़फी का विरोध किया तो अवर निबंधक ने उसकी अनुज्ञप्ति ही रद्द करने का प्रस्ताव ज़िला निबंधन को भेज दिया. जब सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो आवेदन के अगले दिन ही मुकदमा कर जेल भिजवा दिया.

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पहले बसाओ फिर उजाड़ो

समस्तीपुर ज़िले के शिवाजी नगर प्रखंड में मुसहर समुदाय के लोग बसने को ज़मीन नहीं, रहने को घर नहीं, पर सारा जहां हमारा है, के तर्ज़ पर ज़िंदगी गुजार रहे हैं. वे तीन एकड़ जमीन पर किसी तरह झुग्गी-झोपड़ी में रहकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे ब़ढा रहे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि इन मुसहर परिवारों की शासन-प्रशासन ने अब तक कोई खबर नहीं ली है.

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