सरकार आदिवासियों की सुध कब लेगी

छत्तीसगढ़ को क़ुदरत ने अपार संपदा से नवाज़ा है, जिसका उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र के विकास में का़फी सहायक सिद्ध हो सकता है. इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नाममात्र विकास हो पा रहा है.

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झारखंड: रेल परियोजनाओं की कछुआ चाल

खनिज संसाधनों के मामले में देश के सबसे धनी सूबे झारखंड में शायद ही ऐसी कोई योजना है, जो समय पर पूरी हुई हो. एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाने वाली योजनाएं 3 से लेकर 5 साल तक खिंच जाती हैं. योजना के लिए प्राक्कलित राशि भी दोगुनी से तीन गुनी हो जाती है. राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त एवं भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी, असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप और शासन में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारण इस समस्या के मूल में हैं.

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जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

पच्चीस फीट ऊंची रस्सी पर चलता एक इंसान, सड़क के किनारे करतब दिखाता एक बच्चा. शहर के किनारे तंबू डाले कुछ परिवार. आज यहां, कल कहीं और. बिस्तर के नाम पर ज़मीन, छत आसमान. महीने-दो महीने पर शहर बदल जाता है और शायद ज़िंदगी के रंग भी, लेकिन यह कहानी सैकड़ों सालों से बदस्तूर जारी है. यह कहानी है भारत के उन 6 करोड़ घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में यायावर कहते हैं.

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गंगादेवी पल्‍ली में बही विकास की गंगा

आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले की मचापुर ग्राम पंचायत का एक छोटा सा क्षेत्र था गंगादेवी पल्ली. ग्राम पंचायत से दूर और अलग होने के चलते विकास की हवा या कोई सरकारी योजना यहां के लोगों तक कभी नहीं पहुंची. बहुत सी चीजें बदल सकती थीं, लेकिन नहीं बदलीं, क्योंकि लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि कोई आएगा और उनकी ज़िंदगी संवारेगा, बदलाव की नई हवा लाएगा.

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पारिवारिक सर्वेक्षण सूचीः हजारों लोगों के नाम गायब

कमज़ोर बुनियाद पर ऊंची इमारत की हसरत पूरी नहीं हो सकती. अगर ऐसा होता है तो भविष्य में संकट का भय बना रहता है. हम बात कर रहे हैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत सरकार द्वारा प्रदत्त उपभोक्ता वस्तुओं के वास्तविक लाभुकों की समस्याओं से.

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देवघरः नेताओं में मची है खींचतान

देवघर ज़िले में मूलभूत सुविधाओं को पाने के लिए जहां एक तरफ जनता जूझ रही है, वहीं इन दिनों नेताओं में वर्चस्व को लेकर घमासान मचा है. इस बार गर्मी के मौसम में शहरी क्षेत्रों में पेयजल की गंभीर समस्या से शोर मचने की आहट हो चुकी है.

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पंचायत चुनावः निवेश के अड्डे बने चुनाव

झारखंड में 32 वर्षों से लंबित पंचायत चुनाव अंतत: संपन्न हो गए. अब केंद्र सरकार से पंचायतों को मिलने वाली राशि मिलने का रास्ता सा़फ हो गया. चुनाव न होने के कारण झारखंड इससे वंचित रह रहा था. ग्रामीण इलाकों के लोग अब खुद योजनाएं बनाएंगे और उन्हें अमली जामा पहनाएंगे.

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सिर्फ किताबी योजनाएं और खोखले वायदे

स्‍वर्णिम मध्य प्रदेश का संकल्प पत्र तैयार करने की प्रसव वेदना से प्रदेश की भाजपा सरकार पिछले कई महीनों से जिस प्रकार से चीख- पुकार मचा रही थी, उसे लगता था कि सरकार परिवर्तन का भीमसेन जनने वाली है, लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में हुए विचार मंथन के बाद जनता को पता चला कि सरकार का बौद्धिक गर्भपात हो गया.

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कछारी गांव जहां हर शख्‍स बहरा है

कहते हैं कि भारत चमत्कारों का देश है. यहां ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक, अजब-ग़जब और अद्‌भुत समाचार मिल जाते हैं, जो और कहीं नही मिलते. पर कभी-कभी कुछ समाचार ऐसे होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं. कछारी गांव इसका जीगता-जागता उदाहरण है.

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विकास कार्य स़िर्फ काग़ज़ों में सिमटा

यूं तो मध्य प्रदेश में विलुप्त होते आदिवासियों के विकास के लिए हर वर्ष सैंकड़ों योजनाएं लागू की जाती हैं, पर हक़ीक़त ये है कि सभी योजनाएं स़िर्फ काग़ज़ों में सिमट कर रह जाती हैं और इन योजनाओं के लिए स्वीकृत राशि से सरकारी बाबू अपना वारा-न्यारा करते हैं.

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