निरपेक्ष प्रगतिशीलता की दरकार

अभी हाल में साहित्य अकादमी ने विश्‍व कविता समारोह आयोजित किया था, जिसमें भारतीय भाषाओं के कवियों के साथ-साथ विश्‍व

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लोक से दूर होती कविता

एक दिन दफ्तर के साथियों से कविता पर बात शुरू हुई. मेरे मन में सवाल बार-बार कौंध रहा था कि अब कोई दिनकर, बच्चन या श्याम नारायण पांडे जैसी कविताएं क्यों नहीं लिखता. आज जिस तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं, वे स़िर्फ कुछ ख़ास लोगों की समझ में आती हैं और एक सीमित दायरे में ही उन्हें प्रचार-प्रसार और सम्मान मिलता है.

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