अमिताभ ने कुमार विश्वास को थमाया नोटिस, चोरी करने का लगाया आरोप !

नई दिल्ली। कुमार विश्वास का वक्त खराब चल रहा है पार्टी ने उन्हें लगभग दरकिनार कर दिया है और अब

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जश्न-ए-रेख्ता : उर्दू पुनरुत्थान आंदोलन में मील का पत्थर है

उर्दू का जश्न मनाने के लिए आयोजित तीन दिवसीय जश्न-ए-रेख्ता के समापन पर प्रतिभागी इतने प्रभावित हुए कि उन्हें लगा

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अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

कोमलता की पहली अनुगूंज किसी ने सुनी थी जो निरंतर अमरबेल की तरह फैलती रही. समाज, व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा, स्नेह,

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साल 2013 का साहित्यिक लेखा-जोखा

साल 2013 तमाम साहित्यिकगतिविधियों से भरा हुआ रहा. बिल्कुल प्रारम्भ में ही जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान आशीष नन्दी महज़

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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धूप भी चांदनी-सी लगती है

आधुनिक उर्दू शायरी के क्रांतिकारी शायर अली सरदार जा़फरी ने अपनी क़लम के ज़रिये समाज को बदलने की कोशिश की. उनका कहना था कि शायर न तो कुल्हा़डी की तरह पे़ड काट सकता है और न इंसानी हाथों की तरह मिट्‌टी से प्याले बना सकता है. वह पत्थर से बुत नहीं तराशता, बल्कि जज़्बात और अहसासात की नई-नई तस्वीरें बनाता है.

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बच्चों के लिए एक अच्छी किताब

बचपन, उम्र का सबसे प्यारा दौर होता है. यह अलग बात है कि जब हम छोटे होते हैं तो ब़डा होना चाहते हैं, क्योंकि कई बार स्कूल, प़ढाई और रोकटोक से परेशान हो जाते हैं. हम कहते हैं कि अगर ब़डे होते तो हम पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती, न स्कूल ड्रैस पहननी प़डती और न ही रोज़ सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना प़डता. मगर जब हम ब़डे होते हैं, तो अहसास होता है कि वाक़ई बचपन कितना प्यारा होता है.

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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सरल शब्दों में जीवन की अभिव्यक्ति

हाल में आरोही प्रकाशन ने रेणु हुसैन की कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित किए हैं. पहला कविता संग्रह है पानी-प्यार और दूसरे कविता संग्रह का नाम है जैसे. अंग्रेज़ी की वरिष्ठ अध्यापिका रेणु हुसैन स्कूल के व़क्त से ही कविताएं लिख रही हैं.

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रिश्तों की गर्माहट का संग्रह

चौथी दुनिया में लगभग तीन साल से ज़्यादा समय से लिख रहे अपने स्तंभ में कविता और कविता संग्रह पर बहुत कम लिखा. साहित्य से जुड़े कई लोगों ने शिकायती लहज़े में इस बात के लिए मुझे उलाहना भी दिया. कइयों ने कविता के प्रति मेरी समझ पर भी सवाल खड़े किए.

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तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

उर्दू और फारसी शायरी के चमन का यह दीदावर यानी मोहम्मद अल्लामा इक़बाल 9 नवंबर, 1877 को पाकिस्तान के स्यालकोट में पैदा हुआ. उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे, लेकिन क़रीब तीन सौ साल पहले उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था

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करूं न याद, मगर किस तरह भुलाऊं उसे

अहमद फराज़ आधुनिक दौर के उम्दा शायरों में गिने जाते हैं. उनका जन्म 14 जनवरी, 1931 को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कोहाट में हुआ था. उनका असली नाम सैयद अहमद शाह था. उन्होंने पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू और फ़ारसी में एमए किया. इसके बाद यहीं प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई थी. उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था.

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जाने कब तक तेरी तस्वीर निगाहों में रही

पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर के कलाम की खुशबू ने न केवल पाकिस्तान, बल्कि हिंदुस्तान की अदबी फिज़ा को भी महका दिया. वह अपना पहला काव्य संग्रह आने से पहले ही इतनी मशहूर हो चुकी थीं कि जहां भी शेरों-शायरी की बात होती, उनका नाम ज़रूर लिया जाता. उनका पहला काव्य संग्रह खुशबू 1976 में प्रकाशित हुआ

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मूल्यांकन में आलस क्यों

कौन जानता था कि सिमरिया घाट के बालू की रेत पर खेलने वाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर तू आंसू के कण बरसाता चल. यह वही बालक था, जो बाद में राष्ट्रकवि बना और जिनका नाम था रामधारी सिंह दिनकर. रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि थे.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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रहें न रहें हम, महका करेंगे…

मशहूर शायर एवं गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरारुल हसन खान था. उनका जन्म एक अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में हुआ था. उनके पिता पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक थे. मजरूह ने दरसे-निज़ामी का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने लखनऊ के तकमील उल तिब कॉलेज से यूनानी पद्धति की डॉक्टरी की डिग्री हासिल की.

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साहित्य जगत में तकनीकी क्रांति

वर्तमान समय तकनीक का युग हो गया है. इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और नज़दीक आती जा रही है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहां कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकता है. हर क्षेत्र में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. यही हमें साहित्य में भी देखने को मिल रहा है.

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आम आदमी के दुःख-दर्द की किताब

कोई माने या न माने, लेकिन सच यही है कि कविता की कोई शास्त्रीय परिभाषा नहीं होती. वह हर पंक्ति कविता है, जो तरीक़े से आम आदमी के दु:ख-दर्द की बात करती है, घर-आंगन की बात करती है, समाज के काले पक्ष पर रोशनी डालती है और देश-दुनिया के प्रति अपनी चिंता को ज़ाहिर करती है.

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पीछे हूं कहां आपसे रफ्तार में देखें

पाकिस्तान की मशहूर शायरा फ़ातिमा हसन एक अखिल भारतीय मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए पिछले दिनों भारत में थीं. इस दौरान चौथी दुनिया (उर्दू) की संपादक वसीम राशिद ने उनसे एक लंबी बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश:

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डॉ. वैद्यनाथ शर्माः पर्दे के पीछे हैं नंगे, बाहर रूप सजाते हैं

संघर्ष संकुल जीवन के गलियारे से गुज़र कर लक्ष्य के विराट प्रांगण तक एक आम आदमी किस तरह पहुंचता है, यही साबित किया डॉ. वैद्यनाथ शर्मा ने. बहुआयामी रचनाधर्मिता और उदात्त व्यक्तित्व के धनी डॉ. शर्मा उच्च कोटि के शिक्षाविद्, स्वस्थ राजनीतिक चेतना संपन्न बुद्धिजीवी, दूरदर्शी संगठनकर्ता, संवेदनशील कवि, सजग साहित्य समीक्षक, समालोचक, यथार्थवादी कहानीकार, भाव प्रवण विचारक, व्याकरणाचार्य, कुशल शोध प्रज्ञ एवं सक्षम शोध निदेशक हैं.

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नारायण सुर्वे: आम जनता का कवि

ऐसा गामी ब्रह्म, माझे विद्यापीठ एवं जाठीरबामा जैसे कविता संकलनों के रचयिता एवं प्रसिद्ध मराठी विद्वान पद्मश्री नारायण सुर्वे नहीं रहे. पिछले दिनों उनका निधन हो गया, वह 83 साल के थे. नारायण अनाथ थे, बचपन में उनका पालन पोषण सुर्वे नामक मज़दूर ने किया था.

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