इमिगे्रशन पॉलिसी के विरोध में न्यूयार्क में ‘आई एम मुस्लिम’  के लगे नारेे

 डोनाल्ड ट्रम्प की इमिग्रेशन पॉलिसी के विरोध में न्यूयॉर्क में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं. ‘मैं मुस्लिम भी हूं’ के

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मोदी जी! लोगों के विश्वास के साथ शासन करिए… : नीयत सही नीति बदलें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में कहा है कि मीडिया का एक खास तबका उन्हें सत्ता में नहीं आने देना

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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खतरे में भारतीय दूरसंचार क्षेत्र : चीनी घुसपैठ हो चुकी है

पूरी दुनिया टेलीकॉम क्षेत्र में भारत द्वारा की गई प्रगति की प्रशंसा कर रही है. भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दूरसंचार नेटवर्क है. लेकिन विरोधाभास यह है कि दूरसंचार मंत्रालय भी आज तक के सबसे बड़े घोटाले में शामिल है, जिसे टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले का नाम दिया गया. एक लंबे समय तक दूरसंचार मंत्रालय ने बहुत से घनिष्ठ मित्र बनाए, जिन्होंने मनमाने तरीक़े से इस क्षेत्र का दोहन किया.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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भारतीय जल नीति के खतरे

यूनेस्को ने यूनाइटेड नेशन्स वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्टः मैनेजिंग वाटर अंडर अनसर्टेंटी एंड रिस्क पेश की है. इस रिपोर्ट में 2009 के विश्व बैंक के दस्तावेज़ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत में विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग से राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण ने 2009 में एक परियोजना चलाई थी, जिसका उद्देश्य 2020 तक बिना ट्रीटमेंट के नाली तथा उद्योगों के गंदे पानी को गंगा में छोड़े जाने से रोकना था, ताकि गंगा के पानी को सा़फ किया जा सके. गंगा के प्रदूषण के लिए खुली जल निकासी व्यवस्था सबसे अधिक ज़िम्मेदार है.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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काला धन पर बहसः नीति और नीयत दोनों में खोट है

काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर.

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चीन की सरकार डर गई है

वर्ष 2010-11 दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली की समृद्धि के लिए हुई क्रांतियों का गवाह रहा है. इस दरम्यान न सिर्फ आंदोलनकारी चर्चा में रहे, बल्कि कथित तानाशाह शासक भी. चीन में भी लोकतंत्र की बहाली के लिए जमीन तैयार की जा रही है.

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पीओके, पाकिस्तान और चीन

पाकिस्तान की विदेश नीति भारत को केंद्र में रखकर बनाई जाती है. उसने यह सोच रखा है कि जो भारत के हित में हो, वह उसका विरोध करेगा, चाहे उसके हित में हो अथवा नहीं. लेकिन उसे अभी तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि केवल भारत को कमज़ोर करने के लिए वह जो कर रहा है, उससे सबसे ज़्यादा नुकसान उसी को हो सकता है.

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मोदी से सब डरते हैं : महेश भट्ट

दिल किसी पर क्यों यक़ीन करता है, इसका जवाब देना बहुत मुश्किल है. संजीव की बातों पर यक़ीन इसलिए है, क्योंकि गुजरात में उनके साथ जो हो रहा है, वह पहली बार नहीं हुआ और न आख़िरी बार होगा. 2002 के बाद हमने भाजपा की एलिमीनेशन पॉलिसी देखी है, जिसके द्वारा वहां हर उस व्यक्ति को टारगेट किया जाता है, जो नरेंद्र मोदी के विरुद्ध बोलने का साहस करता है.

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मथाई और विदेश नीति

अगले विदेश सचिव के तौर पर रंजन मथाई के नाम पर अंतिम मुहर लग गई है. इसी के साथ अगला विदेश सचिव कौन की दौड़ भी खत्म हो गई है. मथाई 2007 से फ्रांस में भारत के राजदूत के रूप में कार्य कर रहे थे. पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त शरत सभरवाल और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय राजदूत हरदीप पुरी इस पद के अन्य दावेदारों में थे, लेकिन आखिरकार मथाई को ही इस पद के लिए चुना गया.

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वितरण का माध्यम मुद्रा

साम्यवाद के संबंध में अख़बारों से पढ़कर आपने शायद सोचा होगा कि यह रूस द्वारा चलाई गई भयानक आर्थिक नीति है, जिसके द्वारा मानव की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एकांत रूप से उपेक्षित होती है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. साम्यवाद तो वित्त वितरण का बड़ा ही आदरणीय और सुगम मार्ग है, जो हज़ारों वर्षों से, किसी न किसी रूप में, कुछ अंशों में भारत में विद्यमान रहा है.

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राष्‍ट्रीय मुकदमा नीतिः देर से सही, एक दुरुस्‍त फैसला

हमारे देश में ज़्यादातर मुक़दमे छोटे झगड़ों और आपसी अहम की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं. इनमें कई मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालत की जगह घंटों की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है.

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भारत की वन नीति में बदलाव आवश्यक

आज़ादी के बाद बनी भारतीय वन नीति की समीक्षा 1988 में की गई थी, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेरफेर किए बिना यथावत उसे लागू कर दिया गया, जबकि 1975 में नेपाल द्वारा अपनाई गई वन नीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है.

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यह कहीं नई गुलामी तो नहीं

पिछले अंक में हमने अमेरिका और फ्रांस के साथ भारत की विदेश नीति पर चर्चा की थी. 2010 का आख़िरी महीना भारतीय विदेश नीति के वर्तमान और भविष्य के लिहाज़ से महत्वपूर्ण रहा. सबसे आख़िर में आए बेन जिआबाओ, चीनी प्रधानमंत्री. चीन तो बहुत पहले से भारत को परेशान और असंतुलित करने में लगा हुआ है.

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यह कहीं नई गुलामी तो नहीं?

गुट निरपेक्षता, जिसके चलते आज भारत विश्व स्तर पर एक शक्ति के रूप में उभर पाया है, कूड़े के डिब्बे में फेंक दी गई है. नेहरू सरीखी एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी ने जिस ख़ूबसूरती के साथ पंचशील और गुट निरपेक्षता को पाला-पोसा था, उस पूरी पीढ़ी को भी भुला दिया गया है.

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अमेरिका की दोहरी नीति में पिसता पाकिस्‍तान

अपने रणनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दख़ल देता रहता है. उत्तरी से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक दुनिया में कहीं भी कुछ हो तो किसी न किसी तरह वह अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन जाता है. पाकिस्तान इससे अछूता नहीं है.

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मुइवा, मणिपुर और केंद्र की दोहरी नीति

पिछले दस वर्षों से शीर्ष नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएनआईएम) और केंद्र सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला आ रहा है. बीते अप्रैल में हुई नई दौर की वार्ता से लोगों को लगा कि इस बार दोनों पक्ष एक-दूसरे को बेहतर तरीक़े से समझ पा रहे हैं. नए वार्ताकार आर एस पांडे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाक़ात करने के बाद मुइवा से मिले थे.

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जातिगत जनगणना क्यों उचित है

जब संसद में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव ने यह मांग उठाई कि राष्ट्रीय जनगणना में जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए तो देश में थोड़ी चिंता हुई. संसद में भाजपा से जुड़े अनंत कुमार ने तो लालू यादव पर हमला ही बोल दिया तथा उन्हें देशद्रोही जैसा साबित करने की कोशिश की. जो लोग देश में जाति व्यवस्था के ख़िला़फ हैं, उन्हें लगा कि कहीं इससे जाति व्यवस्था को बढ़ाने में मदद न मिले.

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