काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर.
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बिहार को आगे बढ़ाने और संवारने का सपना न केवल नीतीश सरकार ने देखा है, बल्कि यह सपना हर एक बिहारी के दिल में पिछले छह सालों से पल रहा है. न्याय की पटरी पर तेजी से विकास की दौड़ती गाड़ी देखना एक ऐसा ख्वाब है, जिसे हर बिहारी संजोए हुए है और चाहता है कि यह जितनी जल्दी हो, हक़ीक़त का लबादा पहन आम लोगों को दिखने लगे.
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अन्ना हजारे के ख़िला़फ सरकारी मुहिम के स्वयंभू अगुवा रहे कपिल सिब्बल लंबे समय से राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब थे. विवाद प्रिय नेता होने के बावजूद सिब्बल की मीडिया और विवाद से दूरी आश्चर्य चकित ही नहीं करती थी, बल्कि चौंका भी रही थी.
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उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर पर है और कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का शिग़ूफा छोड़ दिया है. कांग्रेस इसलिए, क्योंकि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री कांग्रेस के सदस्य हैं. इसलिए यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि शिगू़फा कांग्रेस ने छोड़ा है.
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उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड सु़र्खियों में है. वोटों की महाभारत में सबकी नज़र बुंदेली भूमि पर है. वर्ष 1987 के राठ विधानसभा उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी सूबे में पहली बार दूसरे नंबर पर आई थी. यहीं से बुंदेलखंड में बसपा के पैर जमने शुरू हुए और आज वह सत्ता में है. लेकिन अब बसपा में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है.
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झारखंड के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में राज्य के पूर्व मंत्री मधु को़डा के साथ हुए हादसे के बाद सूबे में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. कभी अपने विधायकों का समर्थन देकर को़डा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने वाली कांग्रेस का भी पुराना को़डा प्रेम जाग उठा. बस फिर क्या था, को़डा प्रकरण पर राज्य के कांग्रेसी नेता सत्तासीन सरकार की खिंचाई करते नज़र आए.
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पत्रकारिता की ही एक विधा कार्टून अपनी तीक्ष्ण भाषा और कल्पना के सहारे ब़डी से ब़डी कहानी को आसानी से लोगों के दिलो-दिमाग़ तक पहुंचा देता है. राजनीति की कठिन और अबूझ पहेलियों को सुलझाने में कार्टून का एक ब़डा रोल है. राजनीतिक सरोकार को आम आदमी और आम आदमी के सरोकार को राजनीति तक पहुंचाने के एक सशक्त माध्यम के रूप में चौथी दुनिया में मेरी दुनिया कॉलम के तहत प्रकाशित कार्टून भी अपनी भूमिका ब़खूबी निभा रहा है.
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प्रेसीडेंट बुश के ऊपर जूता क्या चला, सारी दुनिया में जूतों की बहार आ गई. हमारे देश में भी यह दूसरा या तीसरा वाक़िया है, जब राजनेताओं के ऊपर हमले हुए. जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंका गया और अब शरद पवार को एक शख्स ने थप्पड़ मारा. ये घटनाएं दो तरह के संकेत देती हैं. पहला संकेत यह है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों से नौजवानों का भरोसा उठ रहा है. उन्हें यह लगता है कि धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, सिविल ना़फरमानी, ये शब्द बेमानी हो गए हैं और इनके ऊपर अमल करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
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पुराने ज़माने में राजाओं के भेष बदलकर जनता के बीच जाने, उनकी समस्याएं जानने, तंत्र की कार्य-शैली से परिचित होने और शासन के प्रति जनभावनाओं से परिचित होने आदि के तमाम क़िस्से सुने जाते हैं.
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अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने चारा डालना शुरू कर दिया है. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने करीब छह माह पहले ही अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण का मामला उछाल दिया था.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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