फारुख अब्दुल्ला ने कहीं बड़़ी बात

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारुख अब्दुल्ला ने कहा है कि राजनीति बुरी नहीं बल्कि राजनीतिज्ञ बुरे

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मफलरमैन से माफ़ीमैन बने केजरीवाल, अभी और चलेगा माफियों का दौर

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल आजकल माफ़ी मांगो राजनीति कर रहे हैं जिसके तहत

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जिससे लेते थे आध्यात्म का ज्ञान उसी से रचाई इमरान खान ने तीसरी शादी

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के फ़ास्ट बॉलर रह चुके और मौजूदा वक्त में तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआई) के प्रमुख इमरान खान तीसरी

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जिससे लेते थे आध्यात्म की शिक्षा उसी के साथ शादी के बंधन में बंधे इमरान खान

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के प्रमुख इमरान खान एक बार फिर से शादी के बंधन में बंध गये है. बता दें

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बीमारी ने कर दिया ऐसा हाल, चलने की हालत में भी नहीं विनोद खन्ना

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : ‘मेरे अपने’, ‘कुर्बानी’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रेशमा और शेरा’, ‘हाथ की सफाई’, ‘हेरा फेरी’, ‘मुकद्दर

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पहले तमिलनाडु और अब पश्चिम बंगाल का भाजपा नेता नए नोट के साथ गिरफ्तार

एक तरफ जहाँ आम लोग कैश के लिए घंटोँ बैंक और एटीएम के आगे कतारोँ मेँ खडे है, वहीँ ऐसी

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मोदी की जीत के मायने

मोदी को जीतना था, क्योंकि विपक्ष ने विकल्प नहीं दिया. जीत का अंतर घटता या बढ़ता, जीतना मोदी को ही था. लेकिन जीत के साथ ही भारतीय राजनीति और ख़ासकर भाजपा के भीतर एक नई किस्म की राजनीति ज़रूर शुरू होने वाली है. यह राजनीति राहुल बनाम मोदी के नाम पर हो सकती है. यह राजनीति मोदी बनाम गडकरी की हो सकती है. यह राजनीति एनडीए के भीतर भी हो सकती है.

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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कांग्रेस में अपनी ढपली-अपना राग : राहुल गांधी की फिक्र किसी को नहीं

कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर है, तो फिक़्र अपने-अपने मुस्तकबिल की. पार्टी में रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले कई नेताओं के लिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बजाय एक मोहरा भर हैं. राहुल गांधी की आड़ में उक्त नेता कांग्रेस पार्टी पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके बीच घमासान इस बात का नहीं है कि आम चुनावों से पहले पार्टी की साख कैसे बचाई जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की है कि राहुल गांधी को अपने-अपने कब्ज़े में कैसे रखा जाए, ताकि सरकार और पार्टी उनके इशारों पर करतब दिखाए.

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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सेना, साज़िश और सियासत

पिछले तीन सालों में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार में घट रही घटनाएं और उसके दूरगामी परिणामों से देश की अवाम चिंतित ही नहीं, बेहद परेशान भी है. पिछले दिनों जिस तरह से देश में सैन्य बग़ावत की खबरों की अटकलें लगीं, वे आज़ाद भारत के इतिहास में एक अनहोनी की तरह है.

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इतना न भुलाओ कि ज़माना भूल जाए

आज जिस तरह भारतीयों के लिए खेल का मतलब क्रिकेट और क्रिकेट का मतलब सचिन तेंदुलकर है, उसी तरह आज़ादी के दौर में खेल का मतलब हॉकी और खिलाड़ी का मतलब ध्यानचंद था. हम ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर के रूप में जानते हैं और सचिन को क्रिकेट का भगवान मानते हैं. यदि 50 साल बाद क्रिकेट को स़िर्फ सचिन तेंदुलकर के नाम से जाना जाए तो क्या यह गावस्कर, कपिल, द्रविड़, गांगुली, कुंबले के साथ ज़्यादती नहीं होगी, जिन्होंने अपना सारा जीवन क्रिकेट की सेवा में लगा दिया.

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मुलायम सिंह का परिवार : अखिलेश-शिवपाल में ठनी रार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का यह नया चेहरा है, जहां नीतियों पर अलगाव है, टकराहट है, सत्ता हथियाने की लालसा है और पार्टी में वर्चस्व को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रहा गुस्सा है. यह अखिलेश यादव का समाजवाद है, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से बिल्कुल उलट है.

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नेचर्स ट्रेल : वन्यजीवों को बचाने की मुहिम

उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा है कि वन्यजीवों का संरक्षण बेहद ज़रूरी है. वह बीते नौ दिसंबर को दिल्ली के मंडी हाउस स्थित ललित कला अकादमी में जाने-माने वन्यजीव फोटोग्राफर, राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवी कमल एम मोरारका की फोटो प्रदर्शनी का अवलोकन कर रहे थे.

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अन्ना ने एक अच्छा मौक़ा गंवा दिया

अन्ना हजारे पर चारों तऱफ से हमला हो रहा है. एक तऱफ राजनीतिज्ञ हमला कर रहे हैं तो दूसरी तऱफ मीडिया हमला कर रहा है. राजनीतिज्ञ दो तरह से हमले कर रहे हैं. पहला हमला उनकी छवि को बिगाड़ने का हो रहा है, जिसका नेतृत्व श्री दिग्विजय सिंह कर रहे हैं. और दूसरा हमला उनकी छवि को भुनाने का हो रहा है, जिसका नेतृत्व श्री मोहन भागवत और भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता कर रहे हैं.

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लोकतंत्र की गुंजाइश खत्‍म हो रही है

क्या कहें, अपना माथा पीटें, भगवान को, अल्लाह को, गॉड को दोष दें, किस पर अपनी खीज निकालें? सीएजी की रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में क्या नहीं है! देखने पर लगता है कि हम जिस देश में रह रहे हैं, उसमें ईमानदार प्रबंधन नाम की कोई चीज ही नहीं बची है. यह टू जी स्पेक्ट्रम का मसला नहीं है, जिसमें प्रधानमंत्री जी ने कह दिया कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. लोग उनको धमकाते रहे. उनके मंत्री ही उनको धमकाते रहे. प्रधानमंत्री खामोश रहे.

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फायरबिसगंज गोली कांडः नेता सिर्फ जख्‍म कुरेदते हैं, मरहम नहीं देते

फारबिसगंज के भजनपुर में अजीब बेचैनी बिखरी पड़ी है. पुलिसिया ख़ौ़फ के साये में यहां सांस लेते लोगों की ज़ुबान बंद है, पर पटना और दिल्ली से आए नेता उनके मुंह में उंगली डाल उनसे बुलवाने की रोजाना कोशिश करते हैं. अपने अजीज़ों को खोने वाले लोगों की आंखें न्याय की आस में रोज खुलती है और रोज बंद होती है, पर इंतज़ार ख़त्म नहीं हो रहा है.

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सामूहिक विवाह कार्यक्रम: अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो

कहते हैं, जिस दिन घर में बेटी पैदा होती है, उसी दिन से बाप की कमर झुक जाती है. बहुत हद तक यह बात भारतीय समाज के लिए सही भी है, क्योंकि दहेज जैसी प्रथा कब एक विकराल सामाजिक समस्या बन गई, पता ही नहीं चला.

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राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए

राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए. पिछले एक महीने की घटी घटनाएं तो यही कह रही हैं. अब वह राजनीतिज्ञ चाहे समाजवादी पार्टी का हो, भारतीय जनता पार्टी का हो या फिर वह कांग्रेस का हो. राजनीतिज्ञ कब क्या करे, कैसे करे, इसके उदाहरण पिछले एक महीने में हमारे सामने बहुत ही खुलेपन के साथ आए हैं.

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जूनियर दादा भी दंगल में

राजनीति के दंगल में स्व दिग्विजय सिंह के छोटे भाई कुमार त्रिपुरारी सिंह ने सादगी से मगर संभावनाओं से भरी इंट्री देकर सबको चौंका दिया है. जदयू में विधिवत शामिल होकर उन्होंने ऐलान किया कि दादा के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए ही उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना है.

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आ़खिर क्यों मानें क़ानून?

वैसे तो कहा जाता है कि क़ानून अंधा होता है, जिसका तात्पर्य यह है कि क़ानून का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध न्यायिक प्रक्रिया बिना भेदभाव के चलनी चाहिए पर यह कथन केवल कथन मात्र ही है. वास्तविकता इससे अलग है. तुलसीदास जी की चौपाई समरथ को नहीं दोष गोसाईं इसी यथार्थ का सर्मथन करती है.

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