सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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जेलों में बढ़ती मुसलमानों की आबादी

आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.

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निगाहें भ्रष्‍टाचार पर, निशाना 2014

अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के बाक़ी सदस्य जब जुलाई 2012 के अनशन के लिए मांगों की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे, तब उन्हें भी यह अहसास रहा होगा कि वे असल में क्या मांग रहे हैं? 15 दाग़ी मंत्रियों (टीम अन्ना के अनुसार), 160 से ज़्यादा दाग़ी सांसदों और कई पार्टी अध्यक्षों के खिला़फ जांच और कार्रवाई की मांग, अब ये मांगें मानी जाएंगी, उस पर कितना अमल हो पाएगा, इन सवालों के जवाब ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि अगर ये मांगें नहीं मानी जाती हैं तब टीम अन्ना का क्या होगा, तब टीम अन्ना क्या करेगी?

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बढ़ती जनसंख्या अभिशाप नहीं

आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि जनसंख्या वृद्धि हानिकारक है. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. आर्थिक दृष्टिकोण के सभी पैमाने भी इसी की पुष्टि करते हैं. अर्थशास्त्रियों की परिभाषा का निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्न की कमी होती है, क्योंकि जिस अनुपात में आबादी में इज़ा़फा होता, उस अनुपात में पैदावार नहीं हो पाती है.

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प्रधानमंत्री का मणिपुर दौरा : जनता के ज़ख़्मों पर विकास का मरहम

बीते एक अगस्त से मणिपुर के दोनों राष्ट्रीय राजमार्गों (एनएच-39 एवं 53) पर यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने आर्थिक नाकेबंदी कर रखी थी. इस 100 दिनों की बंदी ने यहां के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया. हर वस्तु के दाम आसमान छूने लगे.

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सर्वोदय अर्थव्यवस्था

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए.

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संतति नियमन आवश्यक

बढ़ी हुई जनसंख्या निश्चय ही देश का धन है, पर कब और किस हालत में? ज़रा ग़ौर कीजिए. एक दंपत्ति समृद्ध हैं, अपनी परिचर्या के लिए दो नौकर रखे हुए हैं, सब काम उनके वे दोनों नौकर आराम से कर लेते हैं. एक दूसरे दंपत्ति ने अपनी परिचर्या के लिए, अलग-अलग कामों के लिए 9 नौकर तैनात किए हैं. काम इनका भी आराम से हो जाता है. अब बताइए, वे 9 आदमी विशेष काम करते हैं क्या? नहीं.

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शरणार्थी समस्या : सकारात्मक पहल की ज़रुरत

जनसंख्या विस्थापन के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का एक अनूठा इतिहास रहा है. यहां युद्ध के बाद लोग या तो अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल दिए गए अथवा वे जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. इसके बाद पर्यावरणीय या विकासात्मक प्रक्रिया भी विस्थापन की एक वजह बनी.

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जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

पच्चीस फीट ऊंची रस्सी पर चलता एक इंसान, सड़क के किनारे करतब दिखाता एक बच्चा. शहर के किनारे तंबू डाले कुछ परिवार. आज यहां, कल कहीं और. बिस्तर के नाम पर ज़मीन, छत आसमान. महीने-दो महीने पर शहर बदल जाता है और शायद ज़िंदगी के रंग भी, लेकिन यह कहानी सैकड़ों सालों से बदस्तूर जारी है. यह कहानी है भारत के उन 6 करोड़ घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में यायावर कहते हैं.

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आधी आबादी और शिक्षा के अधिकार का सच

भारत में 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का क़ानून भले ही लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयु वर्ग की लड़कियों में से 50 प्रतिशत तो हर साल स्कूलों से ड्राप-आउट हो जाती हैं. ज़ाहिर है, इस तरह से देश की आधी लड़कियां क़ानून से बेदखल होती रहेंगी.

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शेखावाटी की आधी आबादी घूंघट विकास में बाधा नहीं

राजस्थान अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है. यह परंपरा और संस्कृति आज भी यहां की ग्रामीण महिलाओं एवं युवतियों की बदौलत ज़िंदा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पर्दा और परंपरा के आगे इनके सपनों का कोई मोल नहीं है. नवलगढ़ तहसील के एक गांव सिंहासन का ही उदाहरण लीजिए, मीनाक्षी कंवर नामक युवती घूंघट में तो है, लेकिन लैपटॉप पर उसकी उंगलियां बेहिचक चल रही हैं.

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दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.

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स़िर्फ आबादी नहीं आधी शक्ति है हम

महिला बिल पास होने पर चंपारण की महिलाओं में जगा आत्मविश्वास देखते ही बनता है. मैंने जब एक घंटे पहले की एक ग़रीब प्रसूति को इंटरमीडिएट की परीक्षा में कराहते हुए शामिल होते हुए देखा तो मुझसे रहा न गया. मैंने स्वयं उसे परीक्षा डेस्क से हटाकर वहीं क्लास रूम में आराम करने की व्यवस्था की और उसे गर्म पानी व चाय पीने को दिया.

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अल्‍पसंख्‍यकों की हालत समझना जरूरी

संयुक्त राष्ट्र संघ में लगभग दो सौ सदस्य देश हैं, लेकिन इनमें शायद ही कोई मुल्क ऐसा हो, जिसकी पूरी आबादी एक ही मज़हब, भाषा, नस्ल या फिर संस्कृति की हो. यानी इन सभी मुल्कों में बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक आबादी भी है. ऐसे कुछ मामले हो सकते हैं कि एक राज्य में किसी एक समूह का बहुमत न हो, लेकिन एक अल्पसंख्यक समूह कई अन्य के साथ मिलकर पूरी आबादी का पचास फ़ीसदी से कम हो सकता है.

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जुवेनाइल जस्टिस एक्ट : सरकार नहीं, अब अदालत बचाएगी बचपन

युवाओं का देश भारत. 40 फीसदी आबादी की उम्र 18 साल से कम. युवाओं के इस देश में 1 करोड़ 70 लाख बाल श्रमिक और 50 फीसदी बच्चे यौन हिंसा के शिकार भी. बाल श्रम रोकने और बच्चों की देख-रेख और संरक्षण के लिए क़ानून भी हैं. लेकिन फिर भी स्थिति बेकाबू है.

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