घर में दरिद्रता को जन्म देती है आपकी ये छोटी-छोटी गलतियां

घर से दरिद्रता को दूर करने और रखने के लिए लोग अपने घर को साफ-सुथरा रखते हैं. साथ ही समय-समय

Read more

सभी पार्टियों में अम्बेडकर को अपना दिखाने की रेस : हित नहीं, वोट हथियाने की होड़

कांग्रेस से लेकर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी तक सब में दलितवाद की होड़

Read more

दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.

Read more

इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

Read more

कबाड़ बना जुगाड़

इस तकनीकी दुनिया में कोई भी चमत्कार कर सकता है, लेकिन एक किसान केवल खेती से जुड़ा रहता है. ग़रीबी के कारण वह पढ़-लिख नहीं सकता. किसान का नाम सुनते ही खेत और फसल से जुड़ी चीजें ही दिमाग़ में आती हैं

Read more

पूर्वांचल के बुनकरों का दर्दः रिश्‍ता वोट से, विकास से नहीं

केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.

Read more

क्या छत्तीसग़ढ में लोकतंत्र नहीं है

दिल्ली के उन नेताओं को धन्यवाद देना चाहिए, जो पत्रकारिता जगत का नेतृत्व करते हैं. इनके लिए सारा देश दिल्ली है. अगर दिल्ली में किसी अख़बार के साथ कुछ ग़लत हो तो इनके लिए बहुत बड़ा सवाल बन जाता है. अगर किसी पत्रकार के साथ कुछ हो तो और भी बड़ा सवाल बन जाता है.

Read more

ग़रीबी और अमीरी के बीच की खाई बढ़ी है

आजकल 9 फीसदी से कम विकास दर पर काफी चर्चा की जा रही है. हालांकि विकास दर महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि विकास का विषय क्या है. 1991 में हमसे यह वादा किया गया था कि आर्थिक सुधार से विकास दर में वृद्धि होगी और इससे समृद्धि आएगी.

Read more

भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

Read more

वादों का मारा बुंदेलखंड

बुंदेलखंड में चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न चंदन घिसने के लिए तुलसीदास जी हैं. हां, बुंदेलखंड की व्यथा सुनने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ज़रूर बांदा आए. उन्होंने पानी की सुविधा के लिए दो सौ करोड़ रुपये देने का वादा करके आंसू पोंछने की कोशिश की है, लेकिन यहां की जनता के दु:ख-दर्द दूर होते नज़र नहीं आ रहे हैं.

Read more

दलित उद्यमिता का संकल्‍प

सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही.

Read more

कुटुंबक्‍कमः एक गांव, जो विकास का मॉडल है

वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.

Read more

जन्म से पहले की भूख

गरीबों के नाम पर योजनाएं ढेर सारी हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है. भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है. इसी तरह 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं.

Read more

रोजी-रोटी के मुद्दे बेकार उड़नखटोले की महिमा अपरंपार

इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में याद किया जाएगा. आर्थिक व शैक्षणिक रूप से देश के सबसे पिछड़े हुए इस राज्य में अबतक हुए पांच चरणों के चुनाव में कई ऐसे आयाम नज़र आए, जिससे लोकतंत्र शर्मसार होता दिखा.

Read more

लालबत्ती पर लुटता बचपन

राजू की उम्र महज़ 5 साल है. नन्हें-नन्हें हाथ-पैर, मासूम चेहरा, नन्हीं आंखें और शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े पहने राजू दिल्ली के बाराखंभा चौराहे पर बैठा सिग्नल लाल होने का इंतज़ार कर रहा है. अचानक सिग्नल लाल होता है, गाड़ियां रुकती हैं. झट से वह उठकर गाड़ियों के बीच में जाकर तमाशा दिखाने लगता है.

Read more

दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.

Read more

नेपालः राजशाही वापसी की राह पर

नेपाल उबल रहा है. राजनीतिक दलों एवं सरकार की हठधर्मिता के चलते जनता का मोहभंग हो रहा है और देश में अकेली पड़ी राजशाही को अपने लिए नई संभावनाएं दिखने लगी हैं. नए संविधान के गठन की समय सीमा नज़दीक आती जा रही है, लेकिन संविधान का कोई नामोनिशान भी अब तक नज़र नहीं आ रहा.

Read more

प्रधानमंत्री नहीं जानते, देश में कितने बेरोजगार!

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार रोजगार के नाम पर देश के नौजवानों के साथ धोखा कर रही है. रोजगार के नाम पर नई-नई योजनाओं का मजमा लगाए बैठी यूपीए सरकार को यह पता ही नहीं कि देश में बेरोजगारों की संख्या कितनी है. महंगाई रोक पाने में बुरी तरह विफल सरकार नहीं चाहती कि देश के युवाओं को रोजगार मिले, देश से बेरोज़गारी की महामारी खत्म हो.

Read more

शिक्षा का अधिकार कानून का पालन असंभव

भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हुए सभी को शिक्षित करने का एक महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी क़ानून लागू तो कर दिया है, लेकिन प्रदेश में इस क़ानून का पालन होने में अभी कुछ और साल लग सकते हैं.भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हुए सभी को शिक्षित करने का एक महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी क़ानून लागू तो कर दिया है, लेकिन प्रदेश में इस क़ानून का पालन होने में अभी कुछ और साल लग सकते हैं.

Read more

महिला-बाल व्‍यापार का बढ़ता जाल

बाज़ारवाद के इस युग में मनुष्य भी बिकाऊ माल बन गया है. बाज़ार में पुरूष की ज़रूरत श्रम के लिए है, तो वहीं स्त्री की ज़रूरत श्रम और सेक्स दोनों के लिए है. इसलिए व्यापारियों की नज़र में पुरूष की तुलना में स्त्री कहीं ज़्यादा क़ीमती और बिकाऊ है. राजधानी भोपाल की 66 बालिकाएं और 70 बालक ऐसे हैं जिनका पिछले एक साल से कोई अता-पता नहीं है.

Read more

सीहोर : घर की सुध तो ले लो भैया!

राजधानी भोपाल का पड़ोसी ज़िला सीहोर मध्य प्रदेश के अति पिछड़े और ग़रीब ज़िलों में शुमार है, लेकिन इसे गर्व है कि इसने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदर लाल पटवा एवं वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपना जनप्रतिनिधि चुनकर देश और प्रदेश का भाग्य विधाता बनाया.

Read more

नए ब्राह्मणों से ख़तरा

भारतीय लोकतंत्र विनाशकारी ख़तरे में है. यह ख़तरा इसे आत्मविश्वासी, आक्रमक, स्पष्टवादी, देशभक्त एवं साधन संपन्न ताक़तों से है. यह ख़तरा इसे संपन्न लोगों की सफलता से है. यह सलाह देना कुछ अतिशयोक्ति वाली बात हो सकती है कि इस वर्ग की ख़ासियत संवेदनशीलता और अंग्रेज़ी है.

Read more