बढ़ने वाली है जनता की मुश्किलें, फिर से बढ़ेंगे तेल के दाम

आने वाले दिनों में आम जनता की परेशानी और बढ़ सकती है। अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में

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फिर पड़ेगी महंगाई की मार, बढ़ने वाले हैं पेट्रोल डीज़ल के दाम

सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत में बढ़ोतरी करने का मन बना चुकी हैं। कच्चे तेल के

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जीएसटी में फिर हुआ संशोधन, इन चीज़ों के दाम में आएगी कमी

जीएसटी परिषद ने जीएसटी में एक बार फिर से बदलाव किया है. इस बड़े बदलाव की वजह से अब आम

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LPG गैस सिलेंडर के दाम में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोत्तरी, आम आदमी की जेब पर बढेगा बोझ

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : रसोई गैस सिलेंडर के दाम में बढ़ोत्तरी की गयी है. यह बढ़ोत्तरी अब तक की

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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प्रधानमंत्री विदेशी पूंजी लाएंगे

विदेशी पूंजी निवेश के बारे में पिछली बार सरकार ने फैसला ले लिया था, लेकिन संसद के अंदर यूपीए के सहयोगियों ने ही ऐसा विरोध किया कि सरकार को पीछे हटना पड़ा. खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश का विरोध करने वालों में ममता बनर्जी सबसे आगे रहीं. सरकार ने कमाल कर दिया. भारत दौरे पर आई अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ममता से मिलने सीधे कोलकाता पहुंच गईं.

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आत्‍महत्‍या की कीमत हम सब चुकाते हैं

वर्ष 2006 में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री नवीन जिंदल ने संसद में एक मुद्दा उठाया कि भारतीय छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं की वजह क्या है और सरकार किस तरह आत्महत्या के आंकड़े बढ़ने से रोक सकती है. इसके बाद संसद की तऱफ से कुछ विशेष क़ानून बनाए गए. सबसे पहले तो परीक्षाओं से जुड़ी हेल्पलाइन शुरू की गई, जो परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को फोन पर साइकोलॉजिकल एडवाइस देती है.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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मक्का उत्पादकों का दर्द : अनाज की क़ीमत किसान तय करें

जनकवि नागार्जुन ने अकाल के बाद शीर्षक से यह कविता उस दौर में लिखी थी, जब देश में न तो हरित क्रांति आई थी और न आधुनिक तरीक़े से खेती होती थी. उस समय किसान अपनी खेती पूरी तरह परंपरागत ढंग से करते थे.

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मांग के मुताबिक़ मूल्य

पहली योजना है कि हर आदमी जितना वह उपार्जन करे, अपनी मेहनत से पैदा करे, उतना पाए. यह योजना देखने में बड़ी उचित और सुंदर प्रतीत होती है, पर जब इसे कार्यरूप में परिणित करना चाहें तो बड़ी कठिनाइयां पेश आती हैं. पहले तो यह निश्चय कर सकना कि किसने कितना पैदा किया, असंभव सा है.

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महंगाई पर संसद का रवैया हैरान करता है

कहना बहुत सख्त होगा, और हो सकता है कुछ लोगों को बहुत बुरा भी लगे, पर सच्चाई यह है कि संसद इस देश के आम आदमी के दर्द का मज़ाक उड़ा रही है. सात दिनों तक लोकसभा और राज्यसभा नहीं चली, क्योंकि विपक्ष जिस नियम के तहत महंगाई पर बहस चाहता था सरकार उस पर कराने के लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि तब मत विभाजन होता और सरकार शायद हार जाती.

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