आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.
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राज्य की जेलों में वास्तविक क्षमता से चार गुना अधिक संख्या में रखे गए बंदी किस तरह का जीवन जीते होंगे, इसकी कल्पना भी डराती है, साथ ही यह आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए प्रश्नचिन्ह भी है.
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दक्षिणी चीन के सेंजेन स्थित पोर्ट टाउन में 22 भारतीय व्यवसायी पिछले डेढ़ वर्षों से नारकीय ज़िंदगी गुजार रहे हैं. उन पर हीरों की तस्करी का आरोप है. इन कारोबारियों के परिवारीजनों ने भारत सरकार से अपील की है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे और उनकी रिहाई सुनिश्चित कराए.
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महनार में भाजपा कार्यकर्ता सुबोध राय ने अवर निबंधक की लेट लती़फी का विरोध किया तो अवर निबंधक ने उसकी अनुज्ञप्ति ही रद्द करने का प्रस्ताव ज़िला निबंधन को भेज दिया. जब सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो आवेदन के अगले दिन ही मुकदमा कर जेल भिजवा दिया.
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क्या कभी आपने जेल में अपराधियों को पिज़्ज़ा खाते देखा है? नहीं न, मगर दिल्ली के एक जेल में आपको ऐसा शख्स मिल जाएगा. वैसे तो हर मुजरिम को जेल का खाना-खाना पड़ता है. मगर अब अपराधी ही हाई-फाई हो तो भला खाना भी तो उसके स्टैंडर्ड का होना चाहिए.
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घोटालेबाज़ कर्मचारियों को संरक्षण देने और उन्हें बचाने में ग़ाज़ियाबाद के तत्कालीन ज़िला जज आर एस चौबे का नाम सबसे अव्वल है. न्यायाधीश स्तर के ऊंचे अधिकारी और घोटाला करने वाले सामान्य स्तर के कर्मचारी आशुतोष अस्थाना की मिलीभगत के तमाम काग़ज़ी प्रमाण पुलिस को भी मिले और सीबीआई को भी.
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पाकिस्तान में दो साल पहले स्वतंत्रता के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद सस्ते और तात्कालिक न्याय के लिए बड़े-बड़े दावों के साथ वजूद में आने वाली स्वतंत्र न्यायपालिका से तात्कालिक न्याय की उम्मीद आज भी एक सपना ही है. न्यायपालिका की बहाली के बावजूद पाकिस्तानी अदालतों में लंबित पड़े मुक़दमों की संख्या 13 लाख से अधिक हो चुकी है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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