यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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जनता को विकल्प की तलाश है

नरेंद्र मोदी की विजय ने संघ और भारतीय जनता पार्टी में एक चुप्पी पैदा कर दी है. संघ के प्रमुख लोगों में अब यह राय बनने लगी है कि नरेंद्र मोदी को देश के नेता के रूप में लाना चाहिए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेता इस सोच से सहमत नहीं हैं. भारतीय जनता पार्टी के लगभग सभी नेताओं का मानना है कि नरेंद्र मोदी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करते ही देश के 80 प्रतिशत लोग भारतीय जनता पार्टी के ख़िला़फ हो जाएंगे, क्योंकि मोदी की सोच से देश के 16 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 80 प्रतिशत हिंदू सहमत नहीं हैं.

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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अन्ना हजारे नेता नहीं, जननेता हैं

शायद जयप्रकाश नारायण और कुछ अंशों में विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद देश के किसी नेता को जनता का इतना प्यार नहीं मिला होगा, जितना अन्ना हजारे को मिला है. मुझे लगा कि अन्ना हजारे के साथ कुछ समय बिताया जाए, ताकि पता चले कि जनता उन्हें किस नज़रिए से देखती है और उन्हें क्या रिस्पांस देती है.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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जनता को चिढ़ाइए मत, जनता से डरिए

शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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बिहार : भूमिहीन किसानों के साथ धोखाधड़ी

सुशासन में क्या किसानों एवं ग़रीबों को लूटा जाता है, सामान्य तौर पर तो ऐसा नहीं माना जाता है, पर कुछ तथ्य एवं दस्तावेज़ बताते हैं कि बिहार में यही हो रहा है. भूमिहीन किसानों को पावर टिलर काग़ज़ों पर दे दिया जाता है और बदले में उसे बैंक का नोटिस पहुंचा दिया जाता है. सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते दलाल मरे हुए लोगों के नाम पर जाली काग़ज़ात पेश कर और फर्ज़ी हस्ताक्षर कर फसल क्षतिपूर्ति की राशि निकाल रहे हैं.

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जनता को अखिलेश से बहुत उम्मीदें हैं

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दो फैसलों पर उनकी आलोचना हो रही है. पहला फैसला उत्तर प्रदेश में शाम सात बजे केबाद बाज़ारों और मॉल को बिजली न देना और दूसरा फैसला, जिसमें उन्होंने विधायकों को विकास निधि से कार खरीदने की अनुमति दी थी. मुख्यमंत्री के ये दोनों फैसले आलोचना का विषय ज़रूर बनते, लेकिन मुख्यमंत्री ने दोनों ही फैसलों को लागू होने के 24 घंटे के अंदर वापस ले लिया.

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सीरिया : गृह युद्ध के आसार

सीरिया की समस्या बढ़ती जा रही है. हिंसा और प्रतिहिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. अरब लीग के विशेष दूत को़फी अन्नान की शांति योजना भी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. को़फी अन्नान ने कहा है कि सीरिया गृह युद्ध की ओर बढ़ रहा है.

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इतिहास का ड्राफ्ट

वर्ष 2000 में जब बिहार से अलग हटकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया था, उस व़क्त उम्मीद जगी थी कि इलाक़े के आदिवासियों का समुचित विकास होगा और उनकी समस्याओं पर बेहतर तरीक़े से ध्यान दिया जाएगा.

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आरटीआई : कुछ सवाल और जवाब

यह ग़लत है. इसके विपरीत हर अधिकारी को अब यह पता होगा कि वह जो कुछ भी लिखता है, वह जन समीक्षा का विषय हो सकता है. यह उस पर जनहित में उत्तम लिखने का दबाव बनाएगा. कुछ ईमानदार नौकरशाहों ने अलग से स्वीकारा है कि आरटीआई ने उनके राजनीतिक एवं अन्य प्रभावों को दरकिनार करने में बहुत सहायता की है.

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भाजपा विपक्ष नहीं है

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी देश की मुख्य विपक्षी पार्टी है. आपसी फूट, अविश्वास, षड्‌यंत्र, अनुशासनहीनता, ऊर्जाहीनता, बिखराव और कार्यकर्ताओं में घनघोर निराशा के बीच उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में हार का सामना और अलग-अलग राज्यों के पार्टी संगठन में विद्रोह, वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की यही फितरत बन गई है.

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माया को मिटाने की मुहिम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब शपथ ग्रहण की थी तो उन्होंने जनता को विश्वास दिलाया था कि उनकी सरकार बदले की भावना से काम नहीं करेगी. बसपा शासनकाल की वे परियोजनाएं पूरी की जाएंगी, जो अधूरी हैं. अखिलेश युवा एवं ऊर्जावान हैं, उनकी कार्यशैली लोगों ने पहले कभी देखी-समझी नहीं, यही वजह थी उनकी बातें लोगों को अच्छी लगीं.

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जनरल, जनता और जंतर-मंतर

आप इसे सही मान सकते हैं. ग़लत मान सकते हैं, लेकिन सेना के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहली बार हो रहा है, मसलन एक सेनाध्यक्ष का अपनी जन्मतिथि मामले में कोर्ट जाना. कोर्ट द्वारा कोई निर्णय न देकर मामले को सुलझाने की नसीहत देना.

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राहुल को हार का डर सताने लगा है

उत्तर प्रदेश में मिली हार के बाद राहुल ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. राहुल गांधी बात भले ही पूरे प्रदेश की करते दिखते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका सारा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर लगा है. उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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उत्तर प्रदेशः दिल्‍ली के ताज पर मुलायम की नजर

मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश को उत्तर प्रदेश का ताज दिलाकर अपना धर्म-कर्म पूरा कर दिया. अब अखिलेश यादव की पुत्र धर्म निभाने की बारी है. समाजवादी पार्टी के तमाम नेता चाहते हैं कि वर्षों से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे उम्रदराज़ मुलायम के लिए अखिलेश राह निष्कंटक बनाएं. इसके लिए ठीक वैसी ही तैयारियां शुरू की जाएं, जैसी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मुलायम सिंह यादव ने की थीं.

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सपा सरकार : सिर्फ़ मुख्यमंत्री का चेहरा बदला

किसी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए दो-चार सप्ताह का समय पर्याप्त नहीं होता, यह हक़ीक़त है, लेकिन इसके उलट सच्चाई यह भी है कि पूत के पांव पालने में नज़र आने लगते हैं. कुछ यही सोच समाजवादी पार्टी की सरकार को लेकर जनता के बीच बन रही है. कुछ लोग अखिलेश की सरकार को युवाओं की सरकार बता रहे हैं और उससे कई उम्मीदें पाले बैठे हैं.

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हम अपनी बात पर क़ायम हैं

कोयले की कहानी कोयले की तरह और काली होती जा रही है. जब चौथी दुनिया ने 25 अप्रैल-1 मई 2011 के अंक में 26 लाख करोड़ का महाघोटाला शीर्षक से कहानी छापी तो हमें लगा कि हमने एक कर्तव्य पूरा किया, क्योंकि जनता के प्रतिनिधियों, सरकार बनाने वाले प्रतिनिधियों ने हिंदुस्तान के लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा कुछ लोगों की जेब में डाल दिया और उसमें से कुछ पैसा उनकी जेब में भी गया.

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वाद्य यंत्र बनाने का नया तरीक़ा

आम लोगों को लगता है कि सब्जियां केवल खाने के लिए होती हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि सब्जियों का खाने के अलावा भी इस्तेमाल किया जा सकता है. बीजिंग शहर के दो भाइयों ने इस तरह का कारनामा कर दिखाया है.

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कॉरपोरेट्स की सामाजिक ज़िम्मेदारी तय हो

यह आलेख कॉरपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा दिए गए एक भाषण और नए कंपनी बिल-2011 पर आधारित है. वीरप्पा मोइली ने बंगलुरु में हुए एक सम्मेलन, जिसका विषय था-भारत में कॉरपोरेट्‌स का भविष्य, में बोलते हुए नए कंपनी बिल-2011 और कॉरपोरेट्‌स की सामाजिक ज़िम्मेदारी यानी सीएसआर पर अपने विचार रखे थे.

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सही प्रशिक्षण से सफलता मिलेगी

आज पूरा विश्व बैंकिंग और कॉरपोरेट क्षेत्र में आई मंदी की मार झेल रहा है. यूरोप में इसका प्रभाव ज़्यादा दिखा, जबकि भारत इस मंदी से कुछ हद तक अपने को दूर रखने में कामयाब रहा है. भारत ने इसके लिए एक अच्छा रास्ता अपनाया. उसने अपनी घरेलू मांग को बढ़ाया. साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों ने भी कॉरपोरेट क्षेत्र को मंदी से निपटने में सहयोग दिया, लेकिन सरकार का सहयोग और घरेलू मांगों को बढ़ाना ही वैश्वीकरण के इस दौर में मंदी से बचने के लिए का़फी नहीं है.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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