लेखको, मा़फी मांगो

पिछले दिनों लखनऊ में हिंदी के महान रचनाकारों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी का निधन हो गया. मैं श्रीलाल जी से दो बार मिला. एक बार राजकमल प्रकाशन के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में और दूसरी बार राजेंद्र यादव की जन्मदिन की पार्टी में.

Read more

संपादकीय विवेक पर सवाल

बात कई साल पुरानी है. प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से आलोचक देवेंद्र चौबे की किताब समकालीन कहानी का समाजशास्त्र प्रकाशित हुई थी. मैंने कथादेश के संपादक हरि नारायण जी से उक्त किताब पर समीक्षा लिखने की अनुमति मांगी.

Read more

समकालीन साहित्‍य में सार्थक हस्‍तक्षेप

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्घ इतिहास रहा है. दरअसल हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिका के जवाब के रूप में की गई. इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं. उन्होंने 1957 में बनारस से कवि का संपादन-प्रकाशन शुरू किया था.

Read more