विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.
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मुझे प्रेम कथाओं के अलावा जीवनियां और आत्मकथाएं पढ़ने का बेहद शौक है. मेरे मित्र भी अगर कोई नई बॉयोग्राफी पढ़ते हैं तो उसकी जानकारी मुझे देते हैं, साथ ही देश-विदेश के प्रकाशकों के ई-मेल से भी जानकारियां मिलती रहती हैं. जब भी जानकारी मिलती है, उस किताब को ख़रीद लेता हूं.
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कुछ दिनों पहले दिल्ली में बीसवां अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला समाप्त हुआ. दरअसल यह मेला एक साहित्यिक उत्सव की तरह होता है, जिसमें पाठकों की भागीदारी के साथ-साथ देशभर के लेखक भी जुटते हैं और परस्पर व्यक्तिगत संवाद संभव होता है. इस बार के मेले की विशेषता रही किताबों का ताबड़तोड़ विमोचन और कमी खली राजेंद्र यादव की, जो बीमारी की वजह से मेले में शिरकत नहीं कर सके. एक अनुमान के मुताबिक़, इस बार के पुस्तक मेले में हिंदी की तक़रीबन सात से आठ सौ किताबों का विमोचन हुआ.
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हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.
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अभी चंद दिनों पहले की बात है, मेरी पत्नी चित्रा मुदगल की किताब-गेंद और अन्य कहानियां ख़रीद लाई. इस संग्रह के ऊपर दो मासूम बच्चों की तस्वीर छपी है और नीचे लिखा है, बच्चों पर केंद्रित कहानियों का अनूठा संकलन. मुझे भी लगा कि पेंग्विन से चित्रा जी की कहानियों का नया संग्रह आया है, लेकिन जब मैंने उसे उलटा-पुलटा तो लगा कि उसमें तो उनकी पुरानी कहानियां छपी हैं.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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