साठ साल का युवा

यह विचार कि भारत में संसदीय लोकतंत्र होगा और यह साठ वर्षों तक चलेगा तथा उसके बाद और ज़्यादा मज़बूत होता जाएगा, न केवल विंस्टन चर्चिल, बल्कि विश्व के कई देशों के नेताओं को हैरान कर सकता है. मुझे याद है कि पहले मेरे कुछ संबंधी यह तर्क देते थे कि भारत की ज़रूरत राजतंत्र है. यहां तक कि 1857 के विद्रोह का आधार भी मुग़ल शासन को फिर से स्थापित करना था, लेकिन भारत एक लोकतंत्र बना.

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नेपाल : गणतंत्र या राजतंत्र

नेपाल संविधान सभा को इस साल 28 मई तक संविधान बना लेना है. समय निकट है, लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि संविधान सभा यह काम कर पाएगी या नहीं. सरकार ने नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें यह कहा गया था कि संविधान सभा को मिले समय पर पुनर्विचार किया जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था.

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मिथुन दा की छत्रछाया

इस वर्ष फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड एलाइड मज़दूर यूनियन ने गणतंत्र दिवस और अपना वार्षिक उत्सव एक साथ मनाया. यह मज़दूर यूनियन किसी परिचय की मोहताज नहीं है, यह अपनी तरह की एक ही संस्था है और मिथुन चक्रवर्ती की छत्रछाया में फलफूल रही है. इस संस्था के सभी मज़दूर स़िर्फ मिथुन दा को ही अपना चेयरमैन बनाए रखना चाहते हैं और उनके आलावा किसी अन्य को इस पद के लिए स्वीकार नहीं करते.

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समय का फेर

सोमदेव लगता है कि अपने बुरे दौर से गुजर रहे हैं. चोटिल होने के कारण आस्ट्रेलियाई ओपन में नहीं खेलने वाले भारतीय टेनिस खिलाड़ी सोमदेव देववर्मन एटीपी की सोमवार को जारी ताजा विश्व रैंकिंग में 32 स्थान नीचे लुढ़ककर शीर्ष 100 से बाहर हो गए. सोमदेव इससे पहले 90 वें स्थान पर थे, अब वह 464 रेटिंग अंक के साथ 122 वें स्थान पर खिसक गए हैं.

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क्या हम स्वतंत्रता के लायक़ हैं?

गणतंत्र दिवस और महात्मा गांधी की पुण्यतिथि दोनों एक ही महीने में आते हैं. दोनों के बीच के निचोड़ को किस तौर देखा जाए. पाखंड और अतिश्योक्ति से मुक्ति के लिए किए गए कामों की सुरक्षा की जानी चाहिए या उन्हें केवल दस्तावेज़ों में रखा जाना चाहिए. हमने अहिंसा के नैतिक गुण को अपना लिया है, लेकिन जयपुर में हिंसा होने के डर के कारण जो हुआ, उससे तो यही लगता है कि यह सब कहने की बात है.

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प्रजातंत्र के नाम पर चीरहरण

भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.

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हमारा गणतंत्र कहां जा रहा है?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में सुनाया गया हालिया निर्णय भारत के न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर है. एक अर्थ में यह बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की घटना का समापन पर्व है, क्योंकि अदालत ने इस ग़ैर क़ानूनी कृत्य को विधिक स्वीकृति प्रदान कर दी है.

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