जुलाई 2010 में सरकार ने एक आरटीआई के अंतर्गत पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था कि देश में एफसीआई के विभिन्न गोदामों में 1997 से 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल और 2.2 लाख टन धान खराब हो गया था. जुलाई 2012 में एक अन्य आरटीआई के जवाब में एफसीआई ने कहा है कि 2008 से लेकर अब तक देश में एफसीआई के किसी भी गोदाम में अनाज खराब नहीं हुआ है.
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यह खबर उन लोगों के लिए है, जो खाना पकाने के मामले में ज़बरदस्त आलसी हैं. वैज्ञानिकों ने चावल की ऐसी क़िस्म विकसित करने का दावा किया है, जिसे खाने से पहले पकाना आवश्यक नहीं होगा. इस चावल को केवल पानी में भिगोना ज़रूरी होगा. चावल की यह क़िस्म कटक (उड़ीसा) स्थित केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) ने विकसित की है.
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केरल की राजनीति देश के बाक़ी राज्यों की राजनीति से थोड़ी अलग है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि केरल देश का सबसे समृद्ध और सामाजिक रूप से विकसित राज्य है, लेकिन पिछले दशकों की अपेक्षा अब केरल की स्थिति बिगड़ती जा रही है. राजनीति अब चावल की राजनीति बनकर रह गई है. कांग्रेस गठबंधन एक रुपये किलो चावल देने का वादा कर रहा है, क्योंकि उसके विरोधी वामपंथी एलडीएफ ने ढाई रुपये किलो चावल देने की बात की है.
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यह बात उस चावल के बारे में है, जो हम खाते हैं. दुनिया में धान के कुल उत्पादन का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा एशियाई किसानों द्वारा उपजाया जाता है. उपज के लिए इस्तेमाल होने वाले धान का बीज ख़ुद किसान ही बचाकर रखता है और इसकी क़िस्में भी वही होती हैं, जो किसानों के पास होती हैं या शोध संस्थाओं द्वारा परिवर्द्धित होती हैं.
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मध्य प्रदेश में सरकारी गोदामों में लगभग 20 हज़ार टन चावल पिछले डेढ़ वर्ष से पड़ा है. उचित रखरखाव के अभाव में इस चावल की गुणवत्ता दिनों-दिन ख़राब हो रही है. इस चावल का मूल्य लगभग 30 करोड़ बताया जाता है. यह चावल दिसंबर 2008 से जून 2009 के बीच समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान से तैयार किया गया था. उस समय ज़्यादा खरीदी होने के कारण चावल का़फी मात्रा में एकत्रित किया गया.
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भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत के पीछे का एक मक़सद यह भी था कि कम आय वाले लोगों और ग़रीब आदमी को दो व़क्त का भोजन नसीब हो सके, लेकिन ग़रीब लोगों का भोजन भी भ्रष्टाचारियों की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं सका. लगातार आरोप लगते रहे हैं कि ग़रीबों के हिस्से का राशन अधिकारी से लेकर राशन दुकानदार तक मिल-बांट कर खा रहे हैं.
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नीतीश सरकार एक ओर जहां राज्य की माली हालत एवं राजस्व की कमी का रोना रोते हुए विकास के लिए केंद्र से अतिरिक्त सहायता और बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की मांग कर रही है, वहीं दूसरी तरफ परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अधिकारी-दलाल गठजोड़ के कारण राज्य को प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का चूना लग रहा है.
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हस्बे ज़ैल अर्ज कर दूं कि चौथी दुनिया पता नहीं किस-किस दुनिया से घूमते हुए हमें हमारे गांव तक आ जाती है. हुआ यूं है कि हमारे डाकघर का आदमी भी पढ़ा-लिखा है और गांव के कुछ पढ़ाकुओं के बीच उसका उठना-बैठना है. सो, जब कभी भी कोई कागद (अगर रंगीन हुआ तो) वह उसे पहले खोल-खाल कर बांचेगा, फिर रंगीन मिजाज़ पढ़ाकुओं को पढ़वाएगा.
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धान के कटोरे के रूप में विख्यात रोहतास की धरती पर दिन-रात मेहनत करने वाले किसानों की कहानी देश के अन्य हिस्सों में खेती करने वाले किसानों से अलग होती जा रही है. जहां ऐन वक़्त पर खाद की किल्लत से किसानों की कमर लगातार टूटती जा रही है, वहीं सरकारी खरीद केंद्रों पर सक्रिय बिचौलिए किसानों का हक़ मार रहे हैं.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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