यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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सूचना ग़लत मिले तो शिकायत करें

पिछले अंक में हमने आपको प्रथम अपील के बारे में बताया था. आइए, इस अंक में हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि सूचना का अधिकार क़ानून के तहत शिक़ायत क्या होती है, आख़िर अपील और शिकायत में क्या फर्क़ है.

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एक आवेदन से बन जायेगा काम

रिश्वत देना जहां एक ओर आम आदमी की मजबूरी बन चुका है, वहीं कुछ लोगों के लिए यह अपना काम जल्दी और ग़लत तरीक़े से निकलवाने का ज़रिया भी बन गया है, लेकिन इन दोनों स्थितियों में एक फर्क़ है.

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सूचना शुल्क क्या और कितना

सूचना का अधिकार क़ानून के तहत सूचना और आवेदन के बदले पैसा लिए जाने का प्रावधान है, लेकिन इसी प्रावधान का बेजा इस्तेमाल करके कई बार लोक सूचना अधिकारी आवेदकों को परेशान भी करते हैं. सूचना का अधिकार क़ानून के तहत जब आवेदक कोई सूचना मांगता है तो सूचना के बदले पैसा मांगा जाता है.

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औरत के अधिकार के लिए आवाज़ उठाने का मतलब है मुसीबत को हवा देना

औरतों के फर्ज़ की जब बात आती है तो सारा मंच एक तऱफ दिखाई देता है, चाहे वह राजनीतिक हो, धार्मिक हो या फिर स्कॉलर हों या धर्मगुरु. लेकिन जब औरत के हक़ की बात आती है, चाहे उस हक की आवाज़ को दूसरे ही क्यों न उठाएं या वह ख़ुद मांगे, तो सारा समाज अचानक बंट जाता है.

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