ब्राजील: जेल है या गैंगवार का अड्डा, 15 दिनों में 100 मौत

चौथी दुनिया ब्यूरो: ब्राजील के केल में पिछले कुछ समय में कैदियों के बीच मारपीट की घटनाएं काफी तेज हो गई

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कांग्रेस और मुस्लिम संगठनों को सबक़ लेना चाहिए

गुजरात का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए एक अलग तरह का सबक़ है और कांग्रेस के लिए दूसरी तरह का. भारतीय जनता पार्टी न अपनी जीत से कुछ सीखती है और न कांग्रेस अपनी हार से. एक और वर्ग है, जो सबक़ नहीं सीखता और वह है हमारे देश का मुस्लिम समाज. मैं शायद ग़लत शब्द इस्तेमाल कर रहा हूं. मुझे मुस्लिम समाज नहीं, मुस्लिम संगठन और मुस्लिम नेता शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए.

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असम : क्‍यों भड़की नफरत की आग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संसदीय क्षेत्र असम एक के बाद एक, कई घटनाओं के चलते इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. महिला विधायक की सरेआम पिटाई, एक लड़की के साथ छेड़खानी और अब दो समुदायों के बीच हिंसा. कई दिनों तक लोग मरते रहे, घर जलते रहे. राज्य के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार का मुंह ताकते रहे और हिंसा की चपेट में आए लोग उनकी तऱफ, लेकिन सेना के हाथ बंधे थे.

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सुलगता लंदन और पुलिस की भूमिका

ब्रिटेन की राजधानी लंदन के कई शहरों में पिछले दिनों हुए दंगे बेहद दुखद नज़ारे बयां कर रहे थे. आश्चर्य की बात यह है कि मैंने दो हफ्ते पहले ही लंदन छोड़ दिया था. भीषण गर्मी से बचने के लिए हम सभी लंदन में शानदार मौसम का लुत्फ़ ले रहे थे. लंदन में हिंसा उस समय भड़की है, जब वहां ओलंपिक शुरू होने में महज एक साल का वक्त रह गया है. हालांकि लंदन पुलिस पर आरोप है कि उसकी गोलीबारी में मार्क दुग्गन नामक एक ब्रिटिश युवक की मौत हो गई.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं

भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के बावजूद देश में टाडा जैसे क़ानून लागू हुए, मगर अपराध फैलते ही रहे. परिणाम यह हुआ कि जनता की मांग के मद्देनज़र न्याय की प्राप्ति के लिए 2005 और 2009 में विभिन्न स़िफारिशों एवं संशोधनों पर आधारित नया विधेयक प्रस्तुत किया गया. अब 2011 में पुराने क़ानूनों में संशोधन करके नया बिल पेश कर दिया गया है.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक: ईमानदारी से अमल की दरकार

भारतीय जनता पार्टी ने सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक की क़डी आलोचना की है. उसने कहा कि यह बिल खतरनाक है और भेदभाव पर आधारित है. इसका ग़लत इस्तेमाल किया जाएगा, क्योंकि इसमें निष्पक्षता नहीं बरती जा सकती. बिल में इस बात की झलक मिलती है कि सांप्रदायिक दंगे बहुसंख्यक वर्ग द्वारा फैलाए जाते हैं.

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सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए कानून नहीं, इंसाफ की जरुरत

भारत दुनिया का एक मज़बूत लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसने सभी महत्वपूर्ण धर्मों के मानने वालों को अपने यहां शरण दी. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय धार्मिक और आध्यात्मिक रहनुमाओं ने इस सरज़मीं को अपना आशियाना बनाया और पूरा जीवन मानवता के कल्याण, शांति और भाईचारे के लिए अर्पित कर दिया.

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दंगा मुक्त भारत की ओर

विभाजन के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में जबलपुर में हुआ, तबसे दंगों का सिलसिला अनवरत जारी है. 1980 के दशक में सांप्रदायिक हिंसा में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई. विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ा रोड़ा बन गए हैं.

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भागलपुर दंगाः जख्‍म हैं कि भरने का नाम नहीं लेते

21 साल, एक महीना और एक दिन! आप कह सकते हैं, इतना समय कोई भी ज़ख्म भरने के लिए काफी होता है, मगर कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं, जिनके भरने में पीढ़ियां गुजर जाती हैं. बिहार के भागलपुर शहर को भी एक ऐसी ही चोट लगी, जिसके घाव आज भी यहां के बाशिंदों की आंखों से रिसते रहते हैं. दर्द ख़त्म होने का नाम नहीं लेता. कभी मस्ज़िद की अजान से, कभी मंदिरों की घंटियों से तो कभी अदालत के फैसले से यह और भी बढ़ जाता है.

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लाइन में खडा़ किया गोली मारी और लाशें बहा दीं

अगर न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित होना है तो यह कह सकते हैं कि मेरठ के मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है. मई 1987 में हुआ मेरठ का दंगा पच्चीसवें साल में आ चुका है. इस दंगे की सबसे दर्दनाक दास्तां मलियाना गांव और हाशिमपुरा में लिखी गई. खाकी वर्दी वालों का जुर्म हिटलर की नाजी आर्मी की याद दिलाता है.

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दंगों के इतिहास में हाशिमपुरा-मलियाना

भारतीय राजनीति में भ्रष्ट और पाक-साफ़ में फर्क़ नहीं है. भारत के नेताओं में मूढ़ और दूरदर्शी का फर्क़ नहीं है. भारत की सरकारों में सुशासक और कुशासक का भी फर्क़ नहीं है. फर्क़ स़िर्फ एक है और यही फर्क़ प्राथमिक है और पार्टियों को परिभाषित करता है. भाजपा सांप्रदायिक है, संघ सांप्रदायिक है और कांग्रेस, बहुजन समाज और पिछड़ी जातियों की पार्टियां और वामपंथी पार्टियां ग़ैर सांप्रदायिक.

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ज़ख्म आज भी ताज़ा हैं

वक्त बदला, हालात बदले, लेकिन नहीं बदली तो, ज़िंदगी की दुश्वारियां नहीं बदलीं. आंसुओं का सैलाब नहीं थमा, अपनों के घर लौटने के इंतज़ार में पथराई आंखों की पलकें नहीं झपकीं, अपनों से बिछ़डने की तकली़फ से बेहाल दिल को क़रार न मिला. यही है मेरठ के दंगा पी़डितों की दास्तां. मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई, 1987 और मलियाना गांव में 23 मई, 1987 को हैवानियत का जो नंगा नाच हुआ, उसके निशान आज भी यहां देखे जा सकते हैं.

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गुजरात सबसे आगे है

भारत की अर्थव्यवस्था पिछले दो दशकों से निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है. आज भारत विकासशील देशों की सूची में सिर्फ चीन से पीछे है और अटकलें लगाई जाती हैं कि वह चीन को भी जल्दी ही पीछे छोड़ देगा.

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मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू

गुजरात दंगों की जांच के लिए नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी रपट दिसंबर 2010 में उच्चतम न्यायालय को सौंपी. इसके कुछ ही समय बाद देश के एक जाने-माने अख़बार ने अपने पहले पृष्ठ पर एक ख़बर छापी, जिसका शीर्षक था एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दी.

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सांप्रदायिक दंगे और 2010

स्‍वतंत्रता के बाद के भारत में शायद ही कोई ऐसा साल गुजरा हो, जो पूरी तरह से दंगामुक्त रहा हो. कुछ साल तो सांप्रदायिक दंगों की भयावहता और व्यापकता के लिए हमेशा याद किए जाएंगे. इनमें शामिल हैं 1992-93 (बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगे), 2002 (गुजरात) और 2008 (कंधमाल में ईसाई विरोधी हिंसा).

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सिख दंगा पीडि़तः कब मिलेगा न्‍याय

वर्ष 1984 के दंगों के शिकार सिखों को मुआवज़ा दिलाने के लिए दाखिल मूल याचिका के संवेदनशील पन्ने और सात-सात अन्य याचिकाएं अदालत से ग़ायब हैं. मूल याचिका के महत्वपूर्ण पन्ने फाड़ डालने और सात-सात सेकेंडरी रिटें ग़ायब किए जाने जैसे सनसनीखेज मामले की जांच की बात तो छोड़िए, सिखों के मुआवज़े पर जिस भी बेंच ने सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाया, वह बेंच ही ऐन फैसले के वक्त बदल दी गई.

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हमारा गणतंत्र कहां जा रहा है?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण में सुनाया गया हालिया निर्णय भारत के न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर है. एक अर्थ में यह बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की घटना का समापन पर्व है, क्योंकि अदालत ने इस ग़ैर क़ानूनी कृत्य को विधिक स्वीकृति प्रदान कर दी है.

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उदयपुर सांप्रदायिक दंगाः राजस्‍थान पुलिस ने गुजरात दोहराया

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राजस्थान के उदयपुर ज़िले के सारदा नामक क़स्बे में हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच रिपोर्ट मेरे सामने है. यह हिंसा एक मीणा आदिवासी की हत्या के बाद भड़की. यह हत्या विशुद्ध आपराधिक थी. पीयूसीएल के दल में वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश नंदवाना, विनीता श्रीवास्तव, अरुण व्यास, श्यामलाल डोगरा, श्रीराम आर्य, हेमलता, राजेश सिंह एवं रशीद शामिल थे.

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आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो.

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भागलपुर दंगा न्‍याय के नाम पर अन्‍याय का खेल जारी

दो दशक बीत जाने के बावजूद भागलपुर दंगे के घाव अभी तक नहीं भरे हैं. इस दंगे ने न केवल बिहार, बल्कि यहां की सभ्यता-संस्कृति को भी गहरा आघात पहुंचाया. इसने बिहार के राजनीतिक समीकरण को तितर-बितर करके रख दिया

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 21

मियां मिर्ची गुटखा मुंह में घोटे जा रहे थे, लेकिन कुछ बोलने के लिए उनके पेट में बल पड़ रहे थे. वह कुछ राज की बात बताना चाहते थे. उन्होंने चलती गाड़ी में दरवाज़ा खोला और पीक बाहर थूक दी. उन्होंने आनंद भारती की ओर देखा. उन्हें लगा कि बात शुरू की जा सकती है.

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स्मृति शेष: गुलशन बावरा : मेरे देश की धरती सोना…

वर्ष 1973 में आई फिल्म जंजीर का वह दृश्य याद कीजिए, जिसमें एक जोशीला नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर (अमिताभ बच्चन) सड़क हादसे में स्कूली बच्चों की मौत की गवाह एवं चाकू-छुरी में धार रखकर अपना जीवनयापन करने वाली लड़की (जया भादुड़ी) को अपने घर में शरण देता है.

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