गुजरात चुनाव मुसलमान और कांग्रेस

अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है. कांग्रेस पार्टी ने अगले चुनाव की कमान राहुल गांधी को सौंप दी है. राहुल गांधी को 2014 के लोकसभा चुनाव की समन्वय समिति का प्रमुख बनाया गया है. राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, यह बात पहले से ही तय है. इसमें कोई नई बात नहीं है. इस समिति में वही पुराने चेहरे हैं, जो अब तक कांग्रेस की रणनीति बनाते आए हैं. इसलिए कुछ नया होगा, इसकी उम्मीद नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि मुसलमानों के लिए इसमें नया क्या है? सवाल यह है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों को धोखा देकर वोट लेने की कोशिश की, क्या फिर से वही खेल खेला जाएगा?

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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माननीय बोले तो माफ, आमजन बोलें तो बदजुबान

उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान जिन माननीयों की ज़ुबान से असंसदीय भाषा निकली, उनमें मायावती, बेनी प्रसाद वर्मा, नितिन गडकरी एवं सलमान खुर्शीद प्रमुख हैं. इन लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं की तालियां बटोरने के लिए जोश में असंसदीय भाषा से गुरेज़ नहीं किया.

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शिष्टाचार भूलते कांग्रेसी

उत्तर प्रदेश में अपनी दाल न गलती देख कांग्रेस ने राजनीतिक फायदा उठाने के लिए चुनाव आयोग को ठेंगा दिखाने और विपक्ष का अपमान करने की नई मुहिम छेड़ दी है. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी सहित कोई न कोई नेता नित्य-प्रतिदिन चुनाव आयोग, विपक्षी नेताओं और उनकी पार्टियों के बारे में नुक्ताचीनी और अमर्यादित टिप्पणी करते रहते हैं.

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वोट पाने के लिए हर हथकंडा

दिल्ली में राहुल की ताजपोशी का लक्ष्य पूरा करने के लिए कांग्रेस हर वह हथकंडा अपना रही है, जिससे मुस्लिमों के वोट फिर से उसकी झोली में आ जाएं. ऐसा करते समय उसे न तो इस बात की चिंता रही कि वह संविधान से खिलवाड़ कर रही है और न इस बात की कि उसके नेताओं के आचरण से चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को ठेस पहुंच रही है.

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सरकार नहीं चाहती वक्फ संपत्तियों का संरक्षक योग्य व्यक्ति बनें

देश में वक्फ संपत्तियों की खुलेआम लूट कोई नई बात नहीं है और न अब यह बात किसी से छुपी है कि इन संपत्तियों को लूटने में जितना हाथ सरकार का है, उतना ही खुद मुसलमानों का भी है. यह बहुत आसान फार्मूला है कि जिन लोगों को वक्फ बोर्ड की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, वे अपनी इस चोरी को छिपाने के लिए सीधे-सीधे सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दें और देश के आम मुसलमानों को यह कहकर बेवक़ू़फ बनाते रहें कि सरकार ही मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिक है तो उन्हें इंसा़फ कैसे मिल सकता है?

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