इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के नारे खोखले हैं

हम बेरहम शिकंजे में कसे जा चुके हैं. सिविल सोसाइटी को इन चीज़ों की जानकारी होनी चाहिए, लेकिन नहीं है.

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