गुरुग्राम और दिल्ली के बाद बेंगलुरु के स्कूल में 4 साल की बच्ची से हैवानियत

नई दिल्ली: गुरुग्राम के रेयान इंटरनैशनल स्कूल में 7 साल के बच्चे की हत्या का मामला अभी शांत नही हुआ

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यूनिफॉर्म में नहीं पहुंची छात्रा तो टीचर ने दी शर्मनाक सज़ा

नई दिल्ली: हैदराबाद में पांचवीं क्लास में पढ़ने वाली 11 वर्षीय लड़की को बिना यूनिफार्म के स्कूल जाने पर ऐसी

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प्रद्युम्न मर्डर: गिरफ्तार किए गए रेयान दो अधिकारी

नई दिल्ली: हरियाणा पुलिस ने रेयान स्कूल के प्रद्युम्न मर्डर मामले में स्कूल मैनेजमेंट के दो अधिकारियों को गिरफ्तार किया

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एटा में दर्दनाक हादसा : ट्रक से टकराई स्कूल की बस, 25 बच्चों की मौत

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : उत्तर प्रदेश के एटा जिले में एक दर्दनाक बस हादसा हो गया है जिसमें 25

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छिटमहल में राहत और पुनर्वास : भारत से कहीं बेहतर बांग्लादेश

पड़ोसी मुल्क़ बांग्लादेश न स़िर्फ एक छोटा देश है, बल्कि कई मामलों में भारत से पीछे है. पिछले साल हुए

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सवर्ण आयोग ने खोला अगड़ी जातियों का जगीनी सच : रोटी और रोज़गार के लाले

बिहार की ऊंची जातियों में शिक्षा की सच्चाई यह है कि उनके बीच साक्षरता दर सबसे अधिक होने के बावजूद

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पेशावर में मर गई इंसानियत

पाकिस्तान के पेशावर में तहरीक-ए-तालिबान  पाकिस्तान के आतंकियों ने एक स्कूल पर हमला कर करीब 150 लोगों की हत्या कर

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उम्मीदवार का चयन

निर्वाचक मंडल की बैठक किसी ऐसे विद्यालय में बुलाई जाए, जिसके शिक्षक एवं आसपास के लोग लोक उम्मीदवार के विचार

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बच्चों के लिए एक अच्छी किताब

बचपन, उम्र का सबसे प्यारा दौर होता है. यह अलग बात है कि जब हम छोटे होते हैं तो ब़डा होना चाहते हैं, क्योंकि कई बार स्कूल, प़ढाई और रोकटोक से परेशान हो जाते हैं. हम कहते हैं कि अगर ब़डे होते तो हम पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती, न स्कूल ड्रैस पहननी प़डती और न ही रोज़ सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना प़डता. मगर जब हम ब़डे होते हैं, तो अहसास होता है कि वाक़ई बचपन कितना प्यारा होता है.

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स्कूल की हालत कैसे सुधरेगी

सरकारी स्कूल इस देश के करोड़ों बच्चों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं हैं. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के लिए बहुत ही मुश्किल है, जो रोज़ाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर अपना जीवन यापन करती है.

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पाठशाला में कोटा कितना कारगर होगा

देश में छह वर्ष से चौदह साल की आयु के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देने वाले क़ानून राइट टू एजुकेशन को उच्चतम न्यायालय ने अपनी मंज़ूरी दे दी है. न्यायादेश के मुताबिक़, अब देश के सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो गया है.

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शिक्षा के अधिकार से गरीब क्यों वंचित हैं

खबर आई है कि बिहार सरकार संत विनोबा भावे का भूदान आंदोलन एक बार फिर शुरू करने जा रही है. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आंदोलन भूमिहीन किसानों को ज़मीन दिलाने के लिए था, वहीं बिहार सरकार का आंदोलन स्कूलों को ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए होगा. इस आंदोलन के माध्यम से राज्य सरकार लोगों से विद्यालयों के लिए ज़मीन मांगेगी.

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स्कूल की इमारत ख़स्ताहाल क्यों है

सरकारी स्कूल देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण जगह है. यह छात्रों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के वश की बात नहीं, जो रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर जीवनयापन करती है.

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अनुशासन का नायाब तरीक़ा

स्कूली बच्चे ख़ूब नटखट होते हैं, लेकिन जर्मनी के सैक्सनी अनहाल्ट प्रदेश के विटनबर्ग में एक हेडमास्टर ने बच्चों को अनुशासित करने का नया रास्ता निकाला है. बच्चों से कहा गया है कि वे अपने लिए टॉयलेट पेपर लेकर स्कूल आएं.

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सरकारी और निजी स्कूलों से हिसाब मांगे

सूचना का अधिकार क़ानून को लागू हुए क़रीब छह साल होने को हैं. इन छह सालों में इस क़ानून ने आम आदमी को पिछले साठ साल की मजबूरी से मुक्ति दिलाने का काम किया. इस क़ानून ने आम आदमी को सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों से सवाल पूछने की ताक़त दी. व्यवस्था में लगी दशकों पुरानी ज़ंग को छुड़ाने में मदद की.

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मिड डे मील की कछुआ चाल

स्‍कूलों में मिलने वाला दोपहर का भोजन यानी मिड डे मील भी बच्चों को कुपोषण से बचाने में सहायक साबित नहीं हो पा रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) की रिपोर्ट के मुताबिक़, देश में तीन साल से कम उम्र के क़रीब 47 फीसदी बच्चे कम वज़न के हैं. इसके कारण उनका शारीरिक विकास रुक गया है.

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सरकारी स्कूलों का लें हिसाब

शिक्षा का अधिकार क़ानून के तहत छह साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा उनका मौलिक अधिकार होगा. इस क़ानून से उन करोड़ों बच्चों को फायदा मिलेगा, जो स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्राथमिक स्कूलों की मौजूदा संख्या पर्याप्त है? शायद नहीं.

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असमः अब उग्रवाद नहीं अंधविश्वास हावी

असम में अब उग्रवाद से कहीं ज़्यादा हत्याएं अंधविश्वास से हो रही हैं. राज्य की कांग्रेस सरकार स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल परिवर्तन का दावा करती है, पर हक़ीक़त इससे कोसों दूर है. गांवों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए लोग कविराज की झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं.

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क्या आपके बच्चे को छात्रवृत्ति मिली?

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को छात्रवृत्ति दी जाती है, ताकि ऐसे बच्चों, जिनके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है, की पढ़ाई-लिखाई में दिक्कत न आए. इसके लिए बाक़ायदा नियम-क़ानून भी बनाए गए हैं कि कौन बच्चा छात्रवृत्ति का हक़दार होगा और कौन नहीं.

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बच्‍चों का निवाला गट जाते हैं गुरू जी

सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत अबोध बच्चों को शिक्षा के प्रति ललक पैदा करने व उनके शारीरिक विकास के लिए चलाई जा रही मध्यान्ह भोजन योजना का निवाला कोई और ही गटक जाता है. इस मामले में सारण ज़िले का कोई सानी नहीं है.

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खाने के नाम पर जहर

सरकार जनता के कल्याण के लिए चाहे कितनी भी कल्याणकारी योजनाएं चला ले लेकिन हक़ीक़त यही है कि ये सारी योजनाएं सही मायनों में धरातल पर उतरती नज़र नहीं आ रही हैं.

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बदहाल उत्तर प्रदेश में बेहाल शिक्षा

हाल ही में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने शिक्षा के गिरते स्तर और अराजक होते शैक्षिक माहौल से निपटने के लिए राज्य भर के विश्व विद्यालयों के कुलपतियों के साथ गहन चिंतन-मनन किया. राज्यपाल की चिंता इस संदर्भ से जुड़ी थी कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालय गुणवत्तापरक शिक्षा देने में विफल हो रहे हैं, साथ ही अनुशासन बना पाने में भी नाकाम सिद्ध हो रहे हैं.

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दून कोबाड गांधी भी पैदा करता है

दून स्कूल का शीर्ष प्रबंधन इस बात को लेकर चिंता में है कि स्कूल के बच्चों के शिक्षण में कौन सी वर्गीय-खोट है जो कोबाड गांधी को पैदा करती है. दून स्कूल के उच्च वर्गीय चरित्र पर कोबाड गांधी एक सवाल की तरह चस्पा है, जिसने उच्च वर्ग में पैदा होते हुए भी उच्च कुलीन वर्ग का चरित्र नहीं अपनाया और शोषितों-उत्पीड़ितों के हित के संघर्ष के लिए अपना जीवन अति-वामपंथ को न्यौछावर कर दिया. लेकिन दून स्कूल के प्रोडक्ट के रूप में निकले कोबाड गांधी ने स्कूल प्रबंधन के उच्च वर्गीय चरित्र को ज़रूर हिला कर रख दिया है.

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अगर न मिले स्कूल ड्रेस या किताब

सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ने आएं, इसके लिए बहुत सारी सरकारी योजनाएं बनाई गई हैं. जैसे यूनीफॉर्म और किताबों का वितरण. उक्त योजनाएं दरअसल वैसे परिवारों को प्रोत्साहित करने के लिए हैं, जो ग़रीबी की वजह से अपने बच्चों की शिक्षा पर आने वाले ख़र्च को उठा पाने में सक्षम नहीं होते.

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उत्तर प्रदेशः प्राथमिक शिक्षा की तस्‍वीर नहीं बदली

सिर्फ 5200 रुपये में बेच डाला स्कूल पढ़कर आपको आश्चर्य होगा, लेकिन जनपद सुल्तानपुर के गौरीगंज इलाक़े के भटगवां प्राइमरी स्कूल भवन को ग्रामप्रधान ने बेसिक शिक्षा विभाग को सूचना दिए बिना 5200 रुपये में बेचकर जता दिया है कि प्रदेश में शिक्षा का क्या हाल है. वर्ष 2008 की यह घटना जब प्रकाश में आई तो बेसिक शिक्षा विभाग को सांप सूंघ गया.

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मिड डे मील पर लगा ग्रहण

केद्र सरकार की ओर से स्कूली बच्चों के लिए शुरू की गई मिड डे मील योजना पर मगध प्रमंडल में ग्रहण लग गया है. इससे लाखों बच्चों को पोषाहार मिलना बंद हो गया है. केंद्रीयकृत रसोई से मिड डे मील की आपूर्ति करने वाले स्वयंसेवी संगठनों ने भी इसे चलाने से हाथ खड़े कर दिए हैं.

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स्‍कूलों में बच्‍चों की सुरक्षा का सवाल

हाल में उड़ीसा विधानसभा में एक ऐसे मुद्दे को लेकर गहमागहमी बढ़ गई, जिसका सीधा संबंध ग़रीब आदिवासियों की बेबसी और लाचारी की आड़ में उनके शोषण से जुड़ा था. राज्य सरकार द्वारा संचालित जनजातीय विद्यालय, जो ग़रीब एवं पिछड़े आदिवासी छात्रों को शिक्षा का उजाला दिखाने के लिए खोले गए थे, उनके उत्पीड़न का केंद्र बन गए.

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शिक्षा का अधिकार कानून का पालन असंभव

भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हुए सभी को शिक्षित करने का एक महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी क़ानून लागू तो कर दिया है, लेकिन प्रदेश में इस क़ानून का पालन होने में अभी कुछ और साल लग सकते हैं.भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हुए सभी को शिक्षित करने का एक महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी क़ानून लागू तो कर दिया है, लेकिन प्रदेश में इस क़ानून का पालन होने में अभी कुछ और साल लग सकते हैं.

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