शेखावाटी महोत्सव : राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का सजीव चित्रण

  Photo credit : Prabhat Pandey  राजस्थान अपनी विरासत और संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां का हर जिला

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किसानों की सफलता और संस्कृति का संगम

भारत में हर जगह किसी न किसी तरह के मेले का आयोजन होता है. उस मेले का केंद्र कोई वस्तु

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हाईटेक खेती ने जीवन में बिखेरे खुशियों के रंग

शेखावाटी देश के ज़्यादातर किसान अब भी पारंपरिक तरीकों से खेती करते हैं, जो अक्सर घाटे का सौदा साबित होती

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मोरारका फाउंडेशन : सौर लालटेन से रोशन होती जिंदगी

एक तो गरीबी और बचपन से ही विकलांगता की मार झेल रहे व्यक्ति के लिए न तो कोई सरकारी योजना

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सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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शेखावटी- जैविक खेती : …और कारवां बनता जा रहा है

पंजाब में नहरों का जाल है. गुजरात और महाराष्ट्र विकसित राज्य की श्रेणी में हैं. बावजूद इसके यहां के किसानों को आत्महत्या करनी प़डती है. इसके मुक़ाबले राजस्थान का शेखावाटी एक कम विकसित क्षेत्र है. पानी की कमी और रेतीली ज़मीन होने के बाद भी यहां के किसानों को देखकर एक आम आदमी के मन में भी खेती का पेशा अपनाने की इच्छा जागृत होती है, तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई ठोस वजह होगी. आखिर क्या है वह वजह, जानिए इस रिपोर्ट में:

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शेखावाटी उत्सव 2012 राजस्थानी संस्कृति को संजोने का प्रयास

भारत विभिन्न संस्कृतियों एवं परंपराओं का देश है. यही विशेषता इसे दुनिया के अन्य देशों से अलग पहचान दिलाती है, लेकिन इस समय दुनिया में जितनी तेज़ी से परिवर्तन देखने को मिल रहा है, उसमें प्राचीन संस्कृतियों को बरक़रार रख पाना का़फी मुश्किल होता जा रहा है. हालांकि ऐसा नहीं है कि हमने नई चीज़ों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है.

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जैविक खेती समय की जरूरत

राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है.

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शेखावटीः जैविक खेती और बाजार प्रणाली

कुछ व़क्त पहले तक लोग ऑर्गेनिक फूड की ख़ूबियों से वाक़ि़फ नहीं थे. यह विदेशियों की पसंद ज़्यादा हुआ करता था, पर अब हालात बदल चुके हैं. अब भारतीय बाज़ार न स़िर्फ ऑर्गेनिक उत्पादों से भरे पड़े हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर जैविक खेती भी की जा रही है. भारत में जैविक उत्पादों को बढ़ावा देने का श्रेय देश के मशहूर उद्योगपति कमल मोरारका द्वारा संचालित मोरारका फाउंडेशन को जाता है.

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शेखावाटीः बदलाव और कामयाबी का सफर जारी है

करीब दो महीने से चौथी दुनिया आपको लगातार शेखावाटी के बदलते चेहरे के बारे में बता रहा है. अलग-अलग कहानियों के ज़रिए यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि कैसे शेखावाटी विकास की नित नई इबारत लिख रहा है. जैविक खेती करने वाले किसानों ने अपनी सफलता की कहानी खुद अपनी ज़ुबानी बताई. महिलाओं और युवतियों की कामयाबी ने साबित किया कि घूंघट उनके विकास में बाधक नहीं है.

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शेखावाटी की आधी आबादी घूंघट विकास में बाधा नहीं

राजस्थान अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है. यह परंपरा और संस्कृति आज भी यहां की ग्रामीण महिलाओं एवं युवतियों की बदौलत ज़िंदा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पर्दा और परंपरा के आगे इनके सपनों का कोई मोल नहीं है. नवलगढ़ तहसील के एक गांव सिंहासन का ही उदाहरण लीजिए, मीनाक्षी कंवर नामक युवती घूंघट में तो है, लेकिन लैपटॉप पर उसकी उंगलियां बेहिचक चल रही हैं.

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जैविक खेतीः सफलता की कहानी किसानों की जुबानी

एक बहुत पुराना नुस्खा है, जब समस्या बहुत बढ़ जाए तो मूल की ओर लौटो. आज देश में किसानों के आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं ने साफ कर दिया है कि अब व़क्त मूल की ओर लौटने का है. इसका अर्थ यह है कि खेती तब भी होती थी, जब रासायनिक खाद और ज़हरीले कीटनाशक उपलब्ध नहीं थे. तब गोबर किसानों के लिए बेहतर खाद का काम करता था.

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