इगुनगुन : इस देश में पाए जाते हैं जिंदा भूत, इनको छूते ही हो जाती है मौत

नई दिल्ली : पश्चिमी आफ्रीका में बेनिन नाम का एक छोटा सा देश है. यह देश अपनी मान्यताओं और रिवाजों

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कांग्रेस को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए

भारतीय समाज में बहुत सारी कहानियां और कहावतें हैं, जो सैकड़ों-हज़ारों सालों के अनुभवों के बाद सूत्र रूप में बनी

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अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

कोमलता की पहली अनुगूंज किसी ने सुनी थी जो निरंतर अमरबेल की तरह फैलती रही. समाज, व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा, स्नेह,

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ज़िंदगी से प्यार करती हूँ-जीना चाहती हूँ

अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की

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इंसाफ के लिए कहां जाएं

हमें अपनी सोच और समाज की मानसिकता में बदलाव लाना ही होगा, ताकि लोग महिलाओं के  साथ गरिमामय और सौहार्द्रपूर्ण

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प्रधानमंत्री के नाम अन्ना की चिट्ठी

सेवा में,

श्रीमान् डॉ. मनमोहन सिंह जी,

प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली.

विषय : गैंगरेप-मानवता को कलंकित करने वाली शर्मनाक घटना घटी और देश की जनता का आक्रोश सड़कों पर उतर आया. ऐसे हालात में आम जनता का क्या दोष है?

महोदय,

गैंगरेप की घटना से देशवासियों की गर्दन शर्म से झुक गई.

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न थकेंगे, न झुकेंगे

आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.

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भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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अन्ना हजारे की प्रासंगिकता बढ़ गई

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे आपस में लड़ जाएं. अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे इस तथ्य को कितना समझते हैं, पता नहीं. लेकिन अगर उन्होंने इसके ऊपर ध्यान नहीं दिया, तो वे सारे लोग जो उनके प्रशंसक हैं, न केवल भ्रमित हो जाएंगे, बल्कि निराश भी हो जाएंगे.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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वजूद खो रही है भाषाएं

जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे ब़डा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी.

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मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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जनरल की जंग जारी है

जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के इतिहास के एक ऐसे सिपाही साबित हुए हैं, जिसने सेना में रहते हुए भी देश हित में भ्रष्टाचार के खिला़फ जंग लड़ी और सेना से रिटायर होने के बाद भी अपनी उस लड़ाई को जारी रखा. जनरल वी के सिंह जब तक सेना में रहे, वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे और पहली बार ऐसा हुआ कि सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के बारे में उस आम आदमी को पता चला, जिसके पैसों की खुली लूट सेना में मची हुई थी तथा अभी भी जारी है.

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दहेज प्रथा की शिकार बेटियां

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तऱफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं.

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अधिकारों से वंचित हैं मुस्लिम महिलाएं

दुनिया की तक़रीबन आधी आबादी महिलाओं की है. इस लिहाज़ से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. कमोबेश दुनिया भर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है. अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है, ख़ासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है.

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आदर्श सोसायटी घोटाला : कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ेंगी

कहा जाता है कि गिरगिट अपने आसपास के माहौल के अनुसार रंग बदल लेता है. आजकल यह कहावत नेताओं पर सटीक बैठती है. आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच कर रहे आयोग ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को पेश होने के लिए कहा था.

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प्राथमिक शिक्षा : छह दशक हालत जस की तस

हमारे देश में हर नागरिक को प्राइमरी स्तर तक शिक्षा प्रदान करने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. चौदह साल तक की आयु के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार ने 2009 में राइट टू एजुकेशन एक्ट भी पास किया.

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सबसे आसान माध्यम

इतना सब कह चुकने के बाद एक मूल प्रश्न खड़ा होता है कि पैसा है क्या? किस चीज को हम पैसा कहें? कोई भला आदमी बहुत पैसे वाला है तो यह पैसा है क्या? अमुक व्यक्ति के पास बहुत रुपया है, यह रुपया है क्या? यानी रुपया-पैसा, धन-दौलत, रकम-वित्त, कुछ भी कहें, यह जानना ज़रूरी है कि इसका स्वरूप क्या है, इसकी रूपरेखा क्या है?

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जनरल, जनता और जंतर-मंतर

आप इसे सही मान सकते हैं. ग़लत मान सकते हैं, लेकिन सेना के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहली बार हो रहा है, मसलन एक सेनाध्यक्ष का अपनी जन्मतिथि मामले में कोर्ट जाना. कोर्ट द्वारा कोई निर्णय न देकर मामले को सुलझाने की नसीहत देना.

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