चुनौती बनता चीन

चीन की नई-नई गतिविधियां चिंतित कर रही हैं. वह अपने आगे भारत सरीखे देशों को तो कुछ समझता ही नहीं है, उसके लिए अमेरिका की भी कोई खास अहमियत नहीं है. वह अमेरिका विरोधी गतिविधियां भी संचालित कर रहा है. वैसे भारत के लिए यह सुखद है कि वह चाहे तो चीन को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकता है. चीनी गतिविधियों से अमेरिका भी ख़़फा है और चीन के विरुद्ध कार्रवाई के लिए मौक़े की तलाश में है. चीन दुनिया के कई देशों के लिए चुनौती बनता जा रहा है. वह भारत, जापान, नार्वे, दक्षिण कोरिया जैसे देशों को जब-तब झिड़क देता है और अब अमेरिका के विरुद्ध भी चलने की हिम्मत जुटाने लगा है. बावजूद इसके यह समझ से परे है कि आख़िर कोई भी देश चीन के विरुद्ध ठोस क़दम क्यों नहीं उठा रहा है. खासकर अमेरिका को तो चीन के मसले पर कोई न कोई निर्णय लेना ही चाहिए. दुनिया में चीन की दबंगई बढ़ती जा रही है और अन्य देश चुपचाप इसे देख रहे हैं. चुनौती बनते चीन की चतुराई भरी गतिविधियों को सहन करना भविष्य के लिए ठीक नहीं है.

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उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्य और आतंकित ड्रैगन

आख़िरकार भारत ने एक अच्छा काम किया. इसने चीन के लू श्याबाओ को मिले नोबल पुरस्कार समारोह में शिरकत करने का फैसला किया. भारत ने उन देशों से अलग रहने का निर्णय किया, जो इस मुद्दे पर चीन के समर्थन में थे और ली को मिलने वाले पुरस्कार का बहिष्कार कर रहे थे. इस मुद्दे पर चीन का साथ देने वाले ज़्यादातर देशों का रिकॉर्ड मानवाधिकार के मामले में बहुत ख़राब रहा है. मैं जानता हूं, इनमें से कई गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में भारत का गुट निरपेक्ष आंदोलन में बने रहना बेतुका लगता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सउदी अरब, क्यूबा और सोमालिया चीन के साथ खड़े नज़र आए. लेकिन विचित्र बात यह है कि चीन अंतरराष्ट्रीय अनुमोदन से कैसे डरा हुआ है? एक असहमत आदमी को मिले पुरस्कार से चीन इतना चिंतित है कि उसने इसके बहिष्कार की घोषणा कर दी और बाक़ी देशों से भी इसके लिए अपील की. यही कारण है कि चीन ने जल्दबाज़ी में कन्फ्यूशियस पुरस्कार की घोषणा कर दी. मुझे शक है कि हो न हो, अगले साल फिर एक किसी असंतुष्ट चीनी को कहीं नोबल पुरस्कार न मिल जाए.

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नार्वे नहीं, सोमालिया की राह पर

दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश सोमालिया और सबसे अमीर देश नार्वे है. पिछले वर्ष भारत अमीरी के मामले में 78वें स्थान पर था, इस वर्ष 88वें पर है. यानी अमीरी के मामले में हम दस पायदान पीछे खिसके हैं.

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