देश की संसद ठप है. कौन जांच करे, पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी या पब्लिक एकाउंट्स कमेटी, यह बहस है. दोनों ने नाक का सवाल बना लिया है, पर चिंता का विषय है कि क्यों संसद के बाहर न कोई राजनेता और न राजनैतिक दल, एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार तथा कॉमनवेल्थ खेलों में हुए सत्तर हज़ार करोड़ के ख़र्चों में हुई गड़बड़ी को मुख्य मुद्दा नहीं बना रहे हैं.
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हमारे देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मुक़दमों के शीघ्र निपटारे को लेकर न्यायविदों की तऱफ से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है. यहां तक कि पिछले दिनों सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुक़दमों के निस्तारण में लगने वाले लंबे समय पर चिंता जताई थी. एक तऱफ अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई धीमी रफ़्तार से आगे चल रही है, वहीं दूसरी तऱफ नए मुक़दमों का अंबार लगता चला जा रहा है, जिसके चलते अदालतों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस समस्या से निबटने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही है. कोशिशें हो रही हैं, लेकिन समस्या के विकराल रूप को देखते हुए वे काफी कम हैं. लंबित मुक़दमों को तेजी से निपटाने की दिशा में ऐसी ही एक अच्छी कोशिश अभी हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने की.
Tags: CBI, Delhi, Democracy, Judge, Supreme Court, court, judiciary, दिल्ली, न्यायपालिका, न्यायाधीश, लोकतंत्र, सीबीआई, सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट Posted in विधि-न्याय, विविध, समाज by Author: जाहिद खान | No Comments » | Read More... |
न्याय का मूल सिद्धांत बदल रहा है, उसे बदल भी देना चाहिए. जब हमारे मन में उसके लिए कोई न इज़्ज़त हो, और न कोई जज़्बा, तो यही करना उचित है. मूल सिद्धांत है चाहे सौ अपराधी छूट जाएं, पर किसी निर्दोष को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए. अब अलिखित सिद्धांत में पुलिस का भरोसा है कि एक अपराधी को बचाने के लिए सौ निर्दोषों को सज़ा देनी चाहिए.
Tags: Amit Shah, CBI, Gujarat, Kauser Bi, Sheikh, Supreme Court, encounter, अमित शाह, कौसर बी, गुजरात, मुठभेड़, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, सोहराबुद्दीन Posted in जब तोप मुकाबिल हो, संपादकीय by Author: संतोष भारतीय | 2 Comments » | Read More... |
आज आपकी ओर से पूरी राजनैतिक व्यवस्था से बात करेंगे. इसमें सभी राजनैतिक दल, क्या सरकार और क्या विपक्ष, ऐसा हो गया है कि शर्म से कह सकते हैं कि हमाम में सब नंगे हैं. सरकार को एक पैराग्राफ पढ़ने के लिए लिख देते हैं.
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सर्वोच्च न्यायालय अपने नाम, जो इसे सर्वोच्च बताता है, के मुक़ाबले कम ही सर्वोच्च है. यह फांसी की सजा तो सुना सकता है, लेकिन ख़ुद फांसी नहीं दे सकता. सरकार अदालत के आदेश को न मानने की हिम्मत तो नहीं करती, लेकिन सरकार के पास उसे उलटने का विकल्प हमेशा मौजूद रहता है.
Tags: Afzal Guru, Driving, Supreme Court, hanging, अफजल गुरु, ताक़तवर, फांसी, मीडिया, सुप्रीम कोर्ट Posted in आंदोलन, कानून और व्यवस्था, मीडिया, राजनीति, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: एम जे अकबर | No Comments » | Read More... |
जॉर्ज फर्नांडिस. एक ऐसा नाम, जो ग़रीब मज़दूरों, दलितों, समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों, मानवाधिकारों और हर तरह के अन्याय के खिला़फ संघर्ष में पिछले क़रीब तीन दशकों से हमेशा सबसे आगे रहा, आज खुद अपनी ज़िंदगी के लिए संघर्ष को मजबूर है. अथवा यूं कहें कि ज़िंदगी नहीं, जॉर्ज अपनी मौत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
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ईद पर हमने प्रार्थना की थी कि सभी के घर ख़ुशियां दस्तक दें, लेकिन दस्तक महंगाई ने दी, दरवाज़ा ऩफरत ने खटखटाया, यहां तक कि देश में होने वाले कॉमन वेल्थ खेलों को न होने देने की धमकी बाहर से भी मिली और अंदर से भी.
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आज हर कोई भारतीय समाज में महिलाओं को समानता की बात करता है, लेकिन जो बातें की जा रही हैं या जिस बात की वकालत की जा रही है, हक़ीक़त उससे का़फी अलग है. पुरुष प्रधान भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक प्रतिबंधों के चलते महिलाएं हाशिए पर हैं.
Tags: Judge, Parliament, Supreme Court, Women, dowry, political, rape law, दहेज, न्यायपालिका, न्यायाधीश, बलात्कार, महिला, राजनीतिक, लोकसभा, सर्वोच्च न्यायालय, क़ानून Posted in कानून और व्यवस्था, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: रवि किशोर | No Comments » | Read More... |
कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने और संविधान संबंधी मामलों एवं इससे जुड़े दूसरे मसलों को देखने के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार अलग-अलग जगहों पर अभिशून्य पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है.
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अगर न्यायिक इतिहास की दृष्टि से देखें तो बीते साल 2009 को हम मील के पत्थर के तौर पर याद कर सकते हैं. विगत वर्ष की कुछ न्यायिक प्रगतियों और फैसलों की बात करें तो आने वाले वर्षों में वे न्यायपालिका की दिशा को तय करेंगे. न्यायिक संस्थाओं का अगर एक ओर सम्मान बढ़ा तो दूसरी ओर कुछ ऐसी बातें भी हुईं, जिसने आम आदमी की नज़रों में न्यायपालिका की छवि और प्रतिष्ठा को धूमिल करने का काम किया.
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सर्वोच्च न्यायालय यह समझ पाने में सक्षम है कि न्यापालिका की स्वतंत्रता कैसे बहाल हो सकती है. और, उसकी विश्वसनीता कैसे बरक़रार रखी जा सकती है. वह इस बात को भलीभांति समझ सकता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए वकीलों में से योग्य लोगों का चुनाव कैसे किया जा सकता है. लंबे समय से यह दुविधा बनी रही कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता ख़त्म करने के लिए अकेले कार्यपालिका ही ज़िम्मेदार रही है, लेकिन यह भी तय नहीं हो पाया कि न्यायपालिका को किस बात से ज्यादा नुक़सान हो रहा है. पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ, वह इसी ओर संकेत करता है. हाल में न्यायमूर्ति दिनाकरन, न्यायमूर्ति मुखर्जी एवं न्यायमूर्ति चंद्रमौलि की पदोन्नति पर बड़े विवाद हुए थे. न्यायिक व्यवस्था में अंदर तक घुसा भ्रष्टाचार और न्याय को बाज़ार की चीज बना देना आदि भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.
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देश में मौत का अधिकार दिए जाने की मांग एक बार फिर से सु़र्खियों में है. इस मांग ने सर्वोच्च न्यायालय का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है. मामला 61 वर्षीय एक महिला से जुड़ा है. तक़रीबन 36 साल पहले बर्बर बलात्कार की शिकार यह महिला
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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है |
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