ऑड-ईवन 3 में महिलाओं और टू-व्हीलर्स को नहीं मिलेगी छूट

सोमवार से एक बार फिर देश की राजधानी दिल्ली में ऑड-ईवन ड्राइविंग सिस्टम की शुरुआत होने वाली है जिसके तहत

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अब हर कॉल के साथ लीजिए नई रिंगटोन का मज़ा, आ गया है नया ऐप

नई दिल्ली : ज़्यादातर स्मार्टफोन यूज़र कुछ दिन बाद अपने फोन की रिंगटोन से बोर हो जाते हैं ऐसे में

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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सौ समस्याओं का एक समाधान : आरटीआई आवेदन

रिश्वत देना जहां एक ओर आम आदमी की मजबूरी बन गया है, वहीं कुछ लोगों के लिए यह अपना काम जल्दी और ग़लत तरीक़े से निकलवाने का ज़रिया भी बन गया है, लेकिन इन दोनों स्थितियों में एक फर्क़ है. एक ओर 2-जी स्पेक्ट्रम के लिए रिश्वत दी जाती है, तो दूसरी ओर एक आम और बेबस आदमी को राशन कार्ड बनवाने सरकारी पेंशन, दवा एवं इंदिरा आवास पाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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पंचायती राज व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत

देश की बदक़िस्मती कहिए या व्यवस्था की खामी कि किसी भी उद्देश्य को हासिल करने से पहले ही उसमें भ्रष्टाचार के घुन पनपने लगते हैं. चाहे वह खेल के आयोजन का मामला हो, स्वास्थ्य, सीमा की रक्षा करने वाले सैनिकों या गोदामों में अनाज सड़ने का मसला हो, कोई विभाग या क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भ्रष्टाचार हावी न हो.

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दिल्‍ली का बाबूः सीआईसी में पारदर्शिता बढ़ी

केंद्रीय सूचना आयोग के पास बहुत सारे मामले लंबित पड़े हुए हैं, इसलिए उसे आलोचना सहनी पड़ती है. आलोचनाओं से बचने के लिए सूचना आयोग ने अपने काम में पहले से अधिक पारदर्शिता लाने की कोशिश की है.

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विजय माल्या और सियासत का गठजोड़ : आसमान में घोटाला

यह भारतीय लोकतंत्र का बाज़ारू चेहरा है, जो कॉर्पोरेट्स के हितों के मुताबिक़ फैसले लेता है. जहां लोकतंत्र के पहरुवे, भूख से मरते किसानों के लिए रोटी का इंतज़ाम करने का अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं करते, लेकिन उद्योग जगत के महारथियों के क़दमों में लाल क़ालीन बनकर बिछ जाना अपनी शान समझते हैं.

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फालतू धन की माया

ज़मीन या मकान ही ऐसी निजी संपत्ति नहीं थी जिसकी आय पर आदमी बिना कुछ करे घर बैठे खाता-पीता रहे. किराये के धन से भी कहीं ज़्यादा जो फालतू धन लोगों के पास पड़ा है, उसका किराया पूंजीवादियों की दूसरी निजी संपत्ति है. फालतू धन के किराये को हम ब्याज़ के नाम से पुकारते हैं.

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लोकतंत्र राजनेताओं के बिना नहीं चल सकता

किसी भी देश को चलाने के लिए लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है. यह सही है कि इस प्रणाली में भी कई ख़ामियां हैं, लेकिन यह सभी देशों में अलग-अलग तरह से उजागर होती है. दुर्भाग्यवश पिछले साठ सालों में हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जितना विकास होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं, बल्कि इसकी ख़ामियां ही ज़्यादा उजागर हुई हैं.

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शेहला मसूद: सूचना का एक और सिपाही शहीद

भ्रष्टाचार की भंडाफोड़ कोशिशें जानलेवा साबित हो रही हैं. भोपाल की आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की हत्या से पूरे देश में सूचना के अधिकार के तहत जानकारियां लेने का जोख़िम उठा रहे कार्यकर्ता हैरान हैं.

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सरकारी और निजी स्कूलों से हिसाब मांगे

सूचना का अधिकार क़ानून को लागू हुए क़रीब छह साल होने को हैं. इन छह सालों में इस क़ानून ने आम आदमी को पिछले साठ साल की मजबूरी से मुक्ति दिलाने का काम किया. इस क़ानून ने आम आदमी को सत्ता में बैठे ताक़तवर लोगों से सवाल पूछने की ताक़त दी. व्यवस्था में लगी दशकों पुरानी ज़ंग को छुड़ाने में मदद की.

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आपकी समस्याएं और सुझाव

आपके पत्र हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. इस अंक में हम उन पाठकों के पत्र शामिल कर रहे हैं, जिन्होंने बताया है कि आरटीआई के इस्तेमाल में उन्हें किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है और सूचना अधिकार क़ानून को लेकर उनके अनुभव क्या हैं. इसके अलावा इस अंक में मनरेगा योजना और जॉब कार्ड से संबंधित एक आवेदन भी प्रकाशित किया जा रहा है, ताकि आप इसका इस्तेमाल समाज के ग़रीब तबक़े के हित में करके भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारने की एक कोशिश कर सकें.

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बिहारः सुशासन का सच

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नित नई घोषणाओं-योजनाओं की चर्चा और सूचना माध्यमों का इस्तेमाल करके मजबूरी से ज़ार-ज़ार हो रहे लोगों से पटे राज्य और सरकार की कमज़ोरियों से जनता का ध्यान बांटने में फिलव़क्त सफल दिखते हैं. इस सोची-समझी योजना में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने का शिगू़फा भी शामिल है.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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सुप्रीम कोर्ट में बदलाव ज़रूरी है

इस विषय के बारे में लिखने में एक अलग रोमांच है, इसलिए मैं बहुत सी ऐसी बातें यहां लिख सकता हूं, जो कि मैं उच्चतम न्यायालय में जजों के सामने बहस करते समय नहीं बोल सकता. जब बात होती है कि भारतीय न्यायपालिका के साथ क्या परेशानियां हैं तो हमें जवाब में हां या न कहना पड़ता है, लेकिन मेरा जवाब हां भी है और न भी. मैं उच्चतम न्यायालय में वर्ष 1979 से हूं.

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सोने का नहीं, जागते रहने का व़क्त है

भारत की राजनीति में संभवत: सुप्रीम कोर्ट के दख़ल से कई आश्चर्यजनक चीज़ें हो रही हैं. पहले ए राजा का जेल जाना, बाद में सुरेश कलमाडी का और फिर कनिमोझी की जेलयात्रा संकेत देती है कि कई और लोग भी इस राह के संभावित राही हैं. पर यह क्यों सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद हो रहा है?

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मिस्र का सत्‍ता परिवर्तनः तानाशाही नहीं चलेगी

मिस्र के इतिहास में 11 फरवरी, 2011 का दिन उस समय दर्ज हो गया, जब देश की सत्ता पर 30 वर्षों तक क़ाबिज रहने वाले 82 वर्षीय राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भारी जनाक्रोश के चलते राजधानी काहिरा स्थित अपना आलीशान महल अर्थात राष्ट्रपति भवन छोड़कर शर्म-अल-शेख़ भागना पड़ा. तमाम अन्य देशों के स्वार्थी, क्रूर एवं सत्तालोभी तानाशाहों की तरह मिस्र में भी राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने अपनी प्रशासनिक पकड़ बेहद मज़बूत कर रखी थी.

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डुमरांवः शहीदों के परिजन चाय बेच रहे हैं

आज़ाद हिंदुस्तान का ख्वाब लिए हज़ारों क्रांतिकारी सपूत आज़ादी की जंग में खुशी-खुशी शहीद हो गए. इन्हीं में शामिल हैं डुमरांव के चार ऐसे शहीद, जिन्होंने गोरों की गोलियां खाकर अपने खून से आजादी की नई इबारत लिखी. इनकी शहादत पर यहां के लोगों को गर्व है, लेकिन दुभार्र्ग्य यह है कि आज़ाद देश की सरकार इन शहीदों की कुर्बानी को पूरी तरह से भूल गई है.

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ऐतिहासिक धरोहरों पर भू-माफिया की नजर

हिंदुओं की धार्मिक नगरी अयोध्या की प्राचीन धरोहरों का अस्तित्व खतरे में है. भू-माफिया यहां के कुछ संतों व महंतों कीमिलीभगत से प्राचीन कुंडों और सागरों को पाटकर उन्हें बेचने की फिराक में हैं. अगर ऐसा हुआ तो पौराणिक व धार्मिक आस्था की नगरी अयोध्या की गौरवशाली ऐतिहासिक धरोहरों का वजूद ही मिट जाएगा.

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पेंशन के आसरे हैं कई बुज़ुर्ग

एटा में पाश्चात्य संस्कृति की तेज बह रही बयार ने एटा जैसे ज़िले में भी सामाजिक बदलाव ला दिए हैं. यही वजह है कि सामाजिक बदलाव की परिणति के बीच में वृद्धजनों की पारिवारिक उपेक्षा में आए दिन बढ़ोतरी हो रही है. जिस औलाद को बुढ़ापे की लाठी माना, उसी के तिरस्कार ने इस वर्ग के समक्ष बुढ़ापे में रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है.

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बरेली-शाहजहांपुर हादसाः सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

सावधानी शासन की, सावधानी प्रशासन की, सावधानी उस व्यवस्था की, जिसका यह आयोजन था. दुर्घटना अल्हड़ नौजवानों की, दुर्घटना देश के भविष्य की, दुर्घटना परिवार के उस चिराग़ की, जिसके भरोसे अंधेरे से उजाले की ओर जाने का सपना देखा गया था.

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मुस्‍कराएं, आप बख्‍तावरपुरा में हैं

ग्रामसभाओं की निष्क्रियता के कारण सरकारी पंचायतों में काफी भ्रष्टाचार है. ग्रामसभा के नाम पर कुछ लोगों के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं और खानापूर्ति हो जाती है. वास्तविक ग्रामसभा बैठती ही नहीं है. लेकिन देश के कुछ ऐसे गांव हैं, जो इस स्थिति को बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं.

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सोड़ा गांवः फिर से सजने लगी चौपाल

भारत में लोकतंत्र का अर्थ लोक नियुक्त तंत्र बना दिया गया है, जबकि इसे लोक नियंत्रित तंत्र होना चाहिए था. संविधान द्वारा तंत्र संरक्षक की भूमिका में स्थापित है, जबकि उसे प्रबंधक की भूमिका में होना चाहिए था. ज़ाहिर है, संरक्षक लगातार शक्तिशाली होता चला गया और धीरे-धीरे समाज को ग़ुलाम समझने लगा.

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गोदामों में सड़ता अनाज और सरकार

हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर अनाज की बर्बादी पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. गोदामों और खुले आसमान के नीचे रखे अनाज के लगातार सड़ने की घटनाओं पर सख्त रवैया अपनाते हुए अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि अनाज को सड़ने देने के बजाय बेहतर होगा कि उसे मुल्क की ग़रीब जनता में बांट दिया जाए.

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व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है भ्रष्टाचार

लंबे शोध और दुनिया भर में दूरदराज के इलाक़ों का दौरा करने के बाद संसद की सर्वदलीय समिति आख़िर इस नतीजे पर पहुंच ही गई कि पूरी दुनिया में बारिश केवल भारत में ही होती है. समिति का यह काम काबिलेतारी़फ है, क्योंकि उसे सिंगापुर, बाली, लॉस एंजेलिस, न्यूयॉर्क, लंदन और बर्लिन के अलावा सप्ताहांत में हेलसिंकी जैसे दुर्गम इलाक़ों तक का भ्रमण करना पड़ा.

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