अब ऐसी दिखती है ‘उतरन’ की क्यूट ‘इच्छा’, देखकर नहीं होगा यकीन

नई दिल्ली : कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाली सीरियल ‘उतरन’ दो दोस्तों की कहानी घर-घर में देखी जाती रही

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प्रचार नहीं, लोगों का सपना पूरा कीजिए

मोदी सरकार के दो साल पूरे हो गए. दो साल पूरे होने पर जश्न मनाना एक परंपरा भी है और

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पानी को तरस रहे बुंदेलखंड में पानी की तरह बह रहा है पैसा : सट्‌टा लगा रहा है बट्‌टा

विकास को परिभाषित करने के लिए आज हम जिस आधुनिक तकनीक का हवाला देते हैं, उसी आधुनिकता को आधार बनाकर

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मोदी का विदेश दौरा : बेहतर व्यापारिक संबंधों की ओर एक कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन एशियाई देशों की यात्रा चीन के शहर शियान से शुरू हुई. हालांकि, इस यात्रा का

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समाज की यह तस्वीर बहुत डरावनी है

जिस तेजी से समाज में धार्मिक चैनल बढ़े, उसी तेजी से समाज में अपराध का ग्राफ बढ़ा. आख़िर इन चैनलों

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मीडिया की साख से मत खेलिए

अब सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा का कोई मतलब ही नहीं रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा और महाराष्ट्र

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बाबू भाई थीबा :मेहनत से मिला म़ुकाम

बॉलीवुड में आज इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर एसोसिएशन में टीवी के चेयरमैन, टाइटल कमेटी के चेयरमैन और डिस्प्यूट कमेटी के

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया है, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है.

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फिल्म पर डर्टी सलाह

फिल्म डर्टी पिक्चर को एक निजी टेलीविजन चैनल पर प्रसारित न करने की सलाह देकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है. मंत्रालय ने निजी टेलीविजन चैनल को भेजी अपनी सलाह में केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल 1994 का सहारा लिया और उसके सब-रूल 5 एवं 6 का हवाला देते हुए फिल्म का प्रसारण रात ग्यारह बजे के बाद करने की सलाह दी गई.

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वुड चॉपिंग

इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है वुड चॉपिंग. वुड चॉपिंग यानी लकड़ियों की कटाई. पहले पहल तो इस खेल को देखकर लगता है कि शायद यह मज़दूरों का खेल है या फिर शहरों से दूर बसी उस आबादी का, जिसे लकड़ियों में खाना बनाना होता है. लेकिन जैसे ही अमेरिका और आस्ट्रेलिया में होने वाली वुड चॉपिंग चैंपियनशिप में शामिल होते हैं तो आप जान जाते हैं कि यह शौक़ीन मिज़ाज लोगों का एक अजूबा खेल है.

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Congress Mulayam Singh Agreement

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जन्मदिन (4 नवंबर) पर विशेष : बेमिसाल अभिनेत्री तब्बू

आम बॉलीवुड अभिनेत्रियों से अलग हैं तब्बू. उनके बारे में बहुत कम पढ़ने, देखने और सुनने को मिलता है. वह टेलीविजन पर कम आती हैं, मीडिया में इंटरव्यू भी कम देती हैं. सिल्वर स्क्रीन पर तब्बू को फिल्म तो बात पक्की में देखा गया

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ग़रीबी घटाने के लिए रणनीति बदलनी होगी

अन्ना हजारे एक टेलीविजन कार्यक्रम में गए और उन्होंने कहा कि भारत में दो तरह के लोग हैं. पहले तरह के लोग वे हैं, जो कहते हैं कि क्या खाऊं, मतलब यह कि उनके पास खाने को इतना कम है कि उन्हें यह सोचना पड़ता है कि वे क्या खाएं. दूसरे तरह के लोग वे हैं, जो कहते हैं कि क्या-क्या खाऊं, मतलब यह कि उनके पास खाने की इतनी चीजें उपलब्ध हैं कि उन्हें उनमें चुनना पड़ता है कि क्या-क्या खाएं.

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गुलाब सी खिली रवीना

रवीना टंडन फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्री में लौट आई हैं. इंडस्ट्री में वापसी के लिए उन्होंने प्लानिंग पहले ही कर ली होगी, क्योंकि उनकी मेहनत का फल उनकी स्किन को देखकर समझा जा सकता है. चेहरे को ख़ूबसूरत और बॉडी को टोंड बनाए रखने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है.

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टीवी और ब्लड प्रेशर

यदि आपके बच्चे जरूरत से ज्यादा टेलीविज़न देखते हैं या टीवी पर वीडियो गेम खेलते हैं तो उन्हें रोकिए, क्योंकि यह दोनों चीजें बच्चों के रक्तचाप को बढ़ा सकती हैं. यह बात अमेरिका में हुए एक अध्ययन में सामने आई है. 111 बच्चों पर किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि टेलीविज़न और वीडियो देखने, कंप्यूटर के उपयोग और वीडियो गेम खेलने के कारण शारीरिक रूप से निष्क्रिय गतिविधियों की अधिकता हो जाती है, जिसकी वजह से बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती है.

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स्मार्ट टीवी की पेशकश

एलजी ने भारत में दुनिया की पहली 3 डी टी वी, जो दर्शकों को एक झिलमिलाहट रहित टीवी देखने का मौक़ा देती है. अब एलजी ने 3 डी टीवी के माध्यम से अपने घर में 3 डी पैटर्न में टीवी देखने का अनुभव देगा. स्मार्ट टीवी के दो मॉडल एलडब्ल्यू 6500 और एलडब्ल्यू 5700 के रूप में अपने ग्राहकों को कंपनी ने थ्री डी अनुभव को प्राप्त करने का मौक़ा दिया है.

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छोटे पर्दे पर लारा दत्ता

अब छोटा पर्दा छोटा नहीं रहा, तभी तो बॉलीवुड का हर कलाकार अब टीवी पर होस्ट या जज बनता दिखाई दे रहा है. समकालीन लोगों को छोड़ दें, अब तो बीते जमाने की अभिनेत्रियां या जिनकी फिल्में नहीं चल रही हैं, वे सभी टीवी पर दिखाई पड़ रही हैं.

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शहंशाह के आगे बादशाह पस्‍त

फिल्म की दुनिया के एक प्रतिष्ठित अवॉर्ड समारोह में अमिताभ बच्चन को सम्मानित किया जाना था. बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख़ ख़ान समारोह को संचालित कर रहे थे, उन्हें अमिताभ बच्चन को मंच पर आमंत्रित करना था.

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बड़े संपादकों के छोटे सवाल

किसी भी प्रजातंत्र में मीडिया का काम एक प्रहरी का होता है. वह सरकार का नहीं, जनता का पहरेदार होता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सरकार जो करती है और जो नहीं करती है, वह उसे जनता के सामने लाए. जब कभी सत्तारूढ़ दल, विपक्षी पार्टियां, अधिकारी और पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं, तब मीडिया उन्हें उनके कर्तव्यों का एहसास कराता है.

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एलसीडी टीवी का जमाना

इलेक्ट्रॉनिक गुड्‌स की जानी मानी कंपनी एलजी इलेक्ट्रॉनिक ने फुल एलईडी 3डी टीवी एलएक्स-9500 के नाम से भारतीय बाज़ार में उतारा है. इस टीवी की विशेषता यह है कि इसके साउंड एवं पिक्चर क्वालिटी में क्लेरिटी के लिए इसे स्पेक्टेकुलर इनफीनिया द्वारा डिजाइन किया गया है.

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घर आया विदेशी टीवी

जापानी कंपनी अकाई ने भारत में टेलीविजन की नई सीरीज लांच की है. इस नई सीरीज में आने वाले टेलीविजनों में अल्ट्रा स्लिम एलईडी, एलसीडी हाई डेफिनेशन और सीआरटी टेलीविजन हैं.

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सिनेमा के बाजार में फंसा मीडिया

मीडिया की गिरती साख पर चिंता जताते हुए लिखा गया कि पत्रकारिता और मीडिया तो बाज़ार की नब्ज़ नहीं पकड़ पाए, उल्टे बाज़ार ने मीडिया की नब्ज़ पकड़ ली. बात का़फी हद तक सही भी है. आज अ़खबार का हर पन्ना और टीवी कार्यक्रम कोई खबर दिखाने से पहले प्रायोजकों को खुश करता है.

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बच्‍चों को इडियट बॉक्‍स से दूर रखें

हो सकता है कि आपके पास वक़्त न हो और घर के युवा अपने दोस्तों के साथ बाहर गए हों. लेकिन, क्या आपने देखा कि घर के बच्चे कहां हैं? ध्यान दें कहीं आपके घर के नन्हें-मुन्ने इडियट बॉक्स के सामने नज़रें गड़ाए दुनिया के चक्कर तो नहीं लगा रहे हैं.

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स्त्री के विद्रोह की कहानियां

बात अस्सी के शुरुआती दशक की है. उस व़क्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाईस्कूल का छात्र था. यह वह दौर था, जब टेलीविज़न सुदूर शहरी और ग्रामीण इलाक़ों में नहीं पहुंच पाया था. ख़बरों के लिए हम लोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे.

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जनता को ठगने का महामुकाबला

क्‍या सरकार टीवी चैनलों को इसलिए लाइसेंस देती है कि वे जनता को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाएं? क्या सरकारी अधिकारियों को पता नहीं है कि उनके द्वारा जारी लाइसेंस का इस्तेमाल देश की जनता को मूर्ख बनाने में किया जा रहा है? रात के बारह बजते ही कई चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिन पर लाइव लिखा होता है.

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पाकिस्तान अपना नज़रिया बदले

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सड़कों के किनारे नज़र आते पोस्टर्स और टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे विज्ञापनों में पिछले दो साल के दौरान सरकार की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है. सरकार द्वारा प्रायोजित इन विज्ञापनों में इसकी तथाकथित कामयाबियों को ख़ूब ब़ढा-च़ढाकर पेश किया जा रहा है.

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विज्ञापनों का झूठ और आम उपभोक्ता

किसी वर्ग, लिंग या फिर सामाजिक परिदृश्य में विज्ञापनों की विवेचना कोई नई बात नहीं है. वास्तव में ऐसी बहस परिवार और मित्रों के बीच होती रहती है. मुझे यह जानने की जिज्ञासा है कि इस सभ्य समाज में रहने का सबसे बेहतर तरीक़ा क्या है? किस क़िस्म का भोजन हमारे लिए सबसे उचित है या फिर बच्चों के लिए मनोरंजन के क्या साधन सही हैं? विकास का वह कौन सा स्तर है, जो हमारे लिए ज़रूरी है, लेकिन जिसे पाना बहुत ही कठिन है?

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