दिल्ली समेत कई राज्यों में चलेंगी गर्म हवाएं और गर्मी मचाएगी कोहराम

गर्मी के चपेट में पूरा देश तिलमिला रहा है. ऐसे में अगर देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर की बात

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गर्मी को लेकर अलर्ट जारी, इस साल मार्च महीने से ही झेलने पड़ेंगे लू के थपेड़े

अभी मार्च का महीना समाप्त होने को है और गर्मी का कहर दिखाई देने लगा है. मार्च के महीने में

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जलवायु परिवर्तनः सबसे ज़्यादा असर ग़रीबों पर

इस बात से सभी सहमत हैं कि हमारे वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि ही जलवायु परिवर्तन की वजह है. इस नीले ग्रह (पृथ्वी) पर जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी यही है. यदि कोई संदेह रह गया है तो भारत में मानसून की आंख मिचौली और पूरी दुनिया में जलवायु का अनिश्चित व्यवहार इसके प्रमाण हैं.

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उत्तर प्रदेशः सत्ता के दावेदारों में घमासान

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पूर्व ही राजनीतिक तापमान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. सत्ता की दावेदारी करने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों ने सड़कों पर उतर कर अपनी राजनीतिक सक्रियता का प्रमाण देना शुरू कर दिया है.

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पर्यावरण सुरक्षा और भारत

क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति भारत का दृष्टिकोण

भारत ने अगस्त, 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और उसका अनुमोदन किया. इस प्रोटोकॉल की कई शर्तों से भारत को छूट हासिल है और तकनीकी हस्तांतरण एवं विदेशी निवेश के क्षेत्र में फायदा हो सकता है.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा

यदि मानवजनित गतिविधियां अपनी मौजूदा गति से जारी रहीं तो औद्योगिक युग से पहले के मुक़ाबले औसत वैश्विक तापमान में सात डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो जाएगी. तापमान में यह वृद्धि 15000 साल पहले, आख़िरी हिमयुग (आइस एज) के बाद पृथ्वी के तापमान में आई वृद्धि से भी ज़्यादा है.

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