संसद सर्वोच्च है, संसद पवित्र है, संसद लोकतंत्र का मंदिर है और हिंदुस्तान में संसद आज आम आदमी के सुख, सुरक्षा और लोकतंत्र की गारंटी है. इसी संसद ने 1950 में एक संविधान बनाया था. 1950 के बाद संसद का यह धर्म था कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे. सवाल यह है कि क्या संसद ने 1950 में बने संविधान की आत्मा, संविधान की भावना की रक्षा की?
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लंबी प्रतीक्षा के बाद संवैधानिक सुधारों को नेशनल एसेंबली और सीनेट की मंजूरी भले मिल गई हो, लेकिन चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. सुधार प्रस्तावों पर काम करने के लिए सीनेटर रजा रब्बानी और समिति के दूसरे सदस्य तारी़फ के क़ाबिल ज़रूर हैं.
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एक राष्ट्र के रूप में आज हम जिन समस्याओं से रूबरू हैं, वह बेवजह नहीं है. आतंकवाद, बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी, शिक्षा का अभाव, संस्थाओं के बीच टकराव और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए मची होड़ आदि सारी समस्याओं की जड़ में दशकों का कुशासन और देश के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में कमी है.
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आर्य सभ्यता की एक ख़ासियत है, किसी इंसान की मृत्यु हो जाने के बाद हम उसकी अच्छाइयों और उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की कोशिश में अक्सर उसे भगवान के समतुल्य खड़ा कर देते हैं. वास्तव में हमारी संस्कृति में मृत्यु सभी बुराइयों और पापों को धोने वाली कारक बन जाती है.
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कैपिटल पनिशमेंट, जिसे मृत्यु दंड या फांसी के नाम से भी जाना जाता है, का मुद्दा उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच अक्सर गर्मागर्म बहस का कारण बनता रहा है. मृत्यु दंड के ख़िला़फ तर्क देते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है, मृत्यु दंड मानवाधिकारों के उल्लंघन की पराकाष्ठा है. वास्तव में यह न्याय के नाम पर व्यवस्था द्वारा किसी इंसान की सुनियोजित हत्या का एक तरीक़ा है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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