सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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पाकिस्तान को तोड़ने की अमेरिकी कोशिश

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. कुछ महीने पहले अमेरिका ने पाकिस्तानी क्षेत्रों पर ड्रोन हमला किया था, जिसमें पाकिस्तान के 24 सैनिक मारे गए थे. वैसे पाकिस्तानी क्षेत्र पर किया गया यह पहला हमला नहीं था, लेकिन पहली बार इतनी संख्या में सैनिक मारे गए थे. इससे दोनों देशों के बीच संबंध बिगड़ गए और पाकिस्तान ने अपने देश के रास्ते से अ़फग़ानिस्तान को भेजे जाने वाले साजो-सामान को रोक दिया था.

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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्र की गरिमा को पुनर्स्थापित किया

एक बार फिर उच्चतम न्यायालय ने देश की प्रतिष्ठा बचाई और उसका मान रखा. जहां एक तऱफ देश की कार्यपालिका भ्रष्ट मंत्रियों के ख़िला़फ कार्रवाई करने में असफल रही, वहीं एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सम्मान को बचाया और उसकी गरिमा को पुनर्स्थापित किया. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी के सभी लाइसेंस निरस्त कर दिए. सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह बुद्धिमानी का परिचय देते हुए निष्पक्षता दिखाई, वह इस देश के लोकतंत्र के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है.

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मृत्यु दंड : अमानवीय या ज़रूरत

कैपिटल पनिशमेंट, जिसे मृत्यु दंड या फांसी के नाम से भी जाना जाता है, का मुद्दा उसके समर्थकों और विरोधियों के बीच अक्सर गर्मागर्म बहस का कारण बनता रहा है. मृत्यु दंड के ख़िला़फ तर्क देते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल का मानना है, मृत्यु दंड मानवाधिकारों के उल्लंघन की पराकाष्ठा है. वास्तव में यह न्याय के नाम पर व्यवस्था द्वारा किसी इंसान की सुनियोजित हत्या का एक तरीक़ा है.

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डॉक्टर की हर चूक को आपराधिक नहीं माना जाना चाहिए

डॉक्टरों द्वारा मरीजों के प्रति लापरवाही के आरोप की वजह से उनके ख़िला़फ क़ानूनी मामलों में पहले की अपेक्षा वृद्धि हुई है. क्या यह स़िर्फ निर्दोष डॉक्टरों के विरुद्ध शिकायतें हैं या फिर वाक़ई चिकित्सा का स्तर गिरता जा रहा है? पिछले कुछ दशकों में जहां चिकित्सा क्षेत्र में तकनीकी विकास की वजह से जीवन स्तर में सुधार हुआ है, वहीं नैतिक स्तर में गिरावट आई है.

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