अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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कुत्ते लिफ्ट में जाएंगे

आजकल हर इंसान में मोटापा ब़डी समस्या है. उनको सीढ़ियों से चढ़ने उतरने में सुविधा देने और समय की बचत को ध्यान में रखते हुए लिफ्ट का इस्तेमाल शुरू होने लगा. अब तो हर जगह लिफ्ट होती है, लेकिन अब कुत्तों में भी बढ़ती चर्बी एक समस्या बन गई है.

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आईएसआई का उदारवादी नेटवर्क

कश्मीर के बारे में दुनिया के किसी भी व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी देश का रहने वाला हो, लेकिन जब वह व्यक्ति अपनी राय रखने के लिए पैसे लेता है तो इस पर अ़फसोस होता है. दिलीप पडगांवकर, कुलदीप नैयर, जस्टिस राजेंद्र सच्चर और गौतम नौलखा भारत के वे लोग हैं, जिनका हर कोई न केवल सम्मान करता है, बल्कि उन्हें ओपेनियन मेकर भी कहा जाता है.

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अमेरिका-चीन संबंध

पाकिस्तान में जब अलक़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन मारा गया तो अमेरिका की नज़रें कुछ समय के लिए पाकिस्तान के प्रति टेढ़ी हो गईं. तब चीन ने इशारे-इशारे में कह दिया कि वह पाकिस्तान का बाल बांका नहीं होने देगा.

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माधुरी चली परदेस

घक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित सबका दिल लूटने के बाद वापस अमेरिका जा रही हैं. चार महीने तक पूरे इंडिया को नचाने के बाद माधुरी ने फिलहाल बॉलीवुड को बाय कह दिया है.

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युवाओं को सड़क पर उतरना होगा

संसद में नोट फॉर वोट का मामला फिर से इसलिए गरमाया, क्योंकि विकीलीक्स ने अमेरिकी राजनयिक के एक संदेश को सार्वजनिक कर दिया. संसद में न्यूक्लियर डील को लेकर विवाद चल रहा था.

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कानकुन जलवायु सम्मेलन :दो कदम पीछे

मेक्सिको के कानकुन में हुआ 16वां जलवायु परिवर्तन विषयक सम्मेलन अमेरिका और विकसित मुल्कों के अड़ियल रवैये के चलते बिना किसी ठोस नतीजे के ख़त्म हो गया. बीते साल कोपेनहेगन में हुए सम्मेलन की तरह यहां भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकसित और विकासशील मुल्कों के बीच कोई आम सहमति नहीं बन पाई. सम्मेलन शुरू होने के पहले हालांकि यह उम्मीद की जा रही थी कि विकसित मुल्क इस मर्तबा उत्सर्जन कटौती संबंधी कोई क़ानूनी बाध्यकारी समझौते पर अपनी राय बना लेंगे, लेकिन दो हफ्ते की लंबी कवायद के बाद भी कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कोई वाजिब समझौता आकार नहीं ले सका. अलबत्ता सम्मेलन का जो आख़िरी मसौदा सामने निकल कर आया, उसमें कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात ज़रूर कही गई है, मगर इसे कैसे हासिल किया जाएगा, इस पर साफ-साफ कुछ नहीं कहा है.

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ओबामा का भारत प्रेम सिर्फ एक दिखावा है

अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है, दोज़ हू डू नाट लर्न फ्राम हिस्ट्री ऑर कंडेम्ड टू रिपीट इट (जो इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए शापित होते हैं). अन्य कहावतों की तरह यह कहावत भी मानव के पीढ़ियों के संचित ज्ञान एवं अनुभव का निचोड़ है और इसमें छिपे सच को हम भारतीयों को भूलना नहीं चाहिए.

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अमेरिकाः युवा चीनी सैन्‍य अधिकारियों को रिझाने का प्रयास

पेंटागन चीनी सैन्य अधिकारियों, विशेषकर युवा अधिकारियों के साथ नज़दीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. कुछ दिनों पहले पेंटागन और पीपुल्स आर्मी ऑफ चाइना के शीर्ष अधिकारियों के बीच बैठक के बाद अमेरिका ने घोषणा की कि चीन के साथ उसके सैन्य संबंध सामान्य होते जा रहे हैं.

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अजब-ग़जब नाम

अमेरिका के लस्टफुल कोर्ट नामक इलाक़े के निवासियों ने नाम से तंग आकर उसे बदलने के लिए अर्जी दी है. जर्मनी में भी ऐसे कई शहर हैं, जिनके नाम अजीबोग़रीब हैं. उनका अर्थ भी अजीबोग़रीब है. अमेरिका के जार्जिया राज्य में मेकन शहर के लस्टफुल कोर्ट के निवासियों का कहना है कि इस नाम से लोगों में उन्हें लेकर ग़लत धारणाएं पैदा होती हैं.

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पीईडब्‍ल्‍यू ग्‍लोबल एटीट्यूड्स सर्वे रिपोर्टः अमेरिका पाकिस्‍तान का दुश्‍मन है

अमेरिका चाहे जितनी कोशिश करे, लेकिन आम पाकिस्तानी नागरिक उसे अपना दुश्मन ही मानता है. देश में हर दस में से छह नागरिक अमेरिका को दुश्मन की नज़र से देखते हैं. विश्व की एकमात्र महाशक्ति वॉर अगेंस्ट टेरर में पाकिस्तान को अपना सबसे अहम सहयोगी भले ही मानता हो, लेकिन अधिकांश पाकिस्तानी इस युद्ध के ही खिला़फ हैं.

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थूको और पुरस्कार पाओ

अमेरिका में एक दंपत्ति बहुत दूर तक थूकने के लिए मशहूर है. दूर तक थूकने वाली प्रतियोगिता में वह कई बार विजेता भी बन चुका है. यह एक ऐसा अनोखा मुक़ाबला है, जिसके बारे में सुनकर आप हैरान रह जाएंगे. सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या ऐसी भी प्रतियोगिताएं होती हैं.

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अमेरिकी युद्ध अब पाकिस्‍तान में?

पिछले दस सालों के इतिहास का अवलोकन किया जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अगर पाकिस्तान की ओर से बिना शर्त सहयोग न मिलता और खुफिया जानकारियां मुहैय्या न कराई गई होतीं तो अमेरिका को हरगिज़ यह साहस न होता कि वह अ़फग़ानिस्तान में अपनी सेना दाख़िल कर सके.

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पाकिस्‍तान में फौज के आने की आहट

पाकिस्तान से आने वाली ख़बरें चिंता पैदा कर रही हैं. किसी आम आदमी से बात हो रही हो या पत्रकार से, सांसद से या नौकरशाह से, बस एक बात कही जा रही है कि यहां के हालात अच्छे नहीं हैं. कितने अच्छे नहीं हैं, उसके जवाब में कहा जाता है कि बिल्कुल ही अच्छे नहीं हैं, बल्कि बहुत ख़राब हैं.

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बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दानवी चरित्र

यूनियन कार्बाइड कारखाने से हुई दुर्घटना और उसके बाद इस बहुराष्ट्रीय कंपनी की अमानवीय करतूतों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. एक रात में 15 हज़ार से ज़्यादा मासूम नागरिकों को मौत की नींद सुलाने वाली इस कंपनी को हमारी प्रशासनिक-न्यायिक व्यवस्था ने आसानी से कैसे छोड़ दिया?

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अमेरिका को भारत से जोड़ेंगी जै‍कलिन

बॉलीवुड एक्ट्रेस जैकलिन फर्नांडीस यूएस-एशिया बिजनेस फोरम की ब्रांड एंबेसडर बन गई हैं. आइफा अवार्ड में धूम मचाने वाली मिस श्रीलंका जैकलिन के नाम की घोषणा पिछले दिनों की गई.

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अमेरिका की दोहरी नीति में पिसता पाकिस्‍तान

अपने रणनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दख़ल देता रहता है. उत्तरी से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक दुनिया में कहीं भी कुछ हो तो किसी न किसी तरह वह अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन जाता है. पाकिस्तान इससे अछूता नहीं है.

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अल्ट्रासाउंड से गर्भ निरोध!

अमेरिका में वैज्ञानिक एक शोध कर यह पता लगाने में जुटे हैं कि क्या अल्ट्रासाउंड को पुरुषों के लिए अस्थाई गर्भनिरोधक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

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पाकिस्तान अपना नज़रिया बदले

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सड़कों के किनारे नज़र आते पोस्टर्स और टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित किए जा रहे विज्ञापनों में पिछले दो साल के दौरान सरकार की उपलब्धियों को गिनाया जा रहा है. सरकार द्वारा प्रायोजित इन विज्ञापनों में इसकी तथाकथित कामयाबियों को ख़ूब ब़ढा-च़ढाकर पेश किया जा रहा है.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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शाहरूख खान और फॉक्‍स ने ठाकरे और पूरे देश को मूर्ख बनाया

फिल्म के प्रमोशन दो तरह के होते हैं. एक अच्छा प्रमोशन और दूसरा बुरा. अच्छा प्रमोशन वह है, जिसमें लोगों में ख़ुशियां बांटी जाती हैं, सकारात्मक मनोरंजन होता है और जिसमें लोग ख़ुशी-ख़ुशी शरीक होते हैं. बुरा प्रमोशन वह होता है, जिससे समाज में कलह, धार्मिक द्वेष और हिंसा फैलती है. अच्छे और बुरे प्रमोशन में यही फर्क़ होता है. फिल्म माई नेम इज ख़ान ने इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करा लिया.

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दोस्तों ने जॉर्ज को बचाने की अपील की

जॉर्ज फर्नांडिस. एक ऐसा नाम, जो ग़रीब मज़दूरों, दलितों, समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों, मानवाधिकारों और हर तरह के अन्याय के खिला़फ संघर्ष में पिछले क़रीब तीन दशकों से हमेशा सबसे आगे रहा, आज खुद अपनी ज़िंदगी के लिए संघर्ष को मजबूर है. अथवा यूं कहें कि ज़िंदगी नहीं, जॉर्ज अपनी मौत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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गीत चोरी का आरोप कितना सच

प्रख्यात गायक भूपेन हजारिका द्वारा गाई गई रचना- गंगा तुम बहती हो क्यों, उनकी मौलिक कृति नहीं है. उन्होंने संगीत रचना एवं गीत की भावनाएं अमेरिकी कलाकार की एक मशहूर रचना से कॉपी की थी. यह रहस्योघाट्‌न अमेरिका में रह रहे एक भारतीय मुकेश थामस ने पिछले दिनों दोनों संगीत प्रस्तुतियों के गहन अध्ययन के बाद किया है.

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अमेरिका और चीन एक-दूसरे की ज़रूरत हैं

हाल में अमेरिका और चीन के संबंधों में का़फी उथल-पुथल देखने को मिली. इसके बावजूद दोनों देशों के पास एक-दूसरे को सहयोग करने की बेहद ठोस वजह है. यह घटनाक्रम पिछले दो दशकों में विकसित हुआ है. इस बात को दोनों मुल्क स्वीकार करते नज़र आ रहे हैं. ओबामा प्रशासन द्वारा ताइवान को हथियार बेचने के फैसले पर चीन ने उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन उसकी अधिकांश प्रतिक्रिया सांकेतिक ही रही है.

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क्‍या तालिबान आतंकवाद को बेच देगा?

तालिबान को खदेड़ने के लिए अमेरिका ने आठ साल पहले अ़फग़ानिस्तान में क़दम रखा. एक हफ़्ते पहले लंदन में तालिबानियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया कि वे आगे आकर सत्ता में भागीदारी करें. इससे भी अहम बात यह है कि तालिबानियों को ऐसा करने के लिए 1.5 बिलियन डॉलर की पेशकश की गई.

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केजीबी का मिशन और कैंब्रिज फाइव

यह कहानी उस शख्‍स की है, जिसका जन्म तो भारत में हुआ, लेकिन वह एक ब्रिटिश आर्मी अ़फसर का बेटा था, यानी ब्रिटिश नागरिक. पर पूरी ज़िंदगी उसने एक ऐसी ख़ु़फिया एजेंसी के लिए काम किया, जो ख़ौ़फ और क़हर का दूसरा नाम है. केजीबी के लिए.

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क्‍या भारत को हॉलब्रूक की जरूरत है?

अफग़ानिस्तान और पाकिस्तान में तैनात अमेरिकी दूत रिचर्ड हॉलब्रूक अ़फग़ानिस्तान-पाकिस्तान नीति में अमेरिका की जीत के लिए भारत को फ़ायदेमंद मानते हैं. यह कोई पहला मौक़ा नहीं है, जब रिचर्ड हॉलब्रूक ने अ़फग़ानिस्तान-पाकिस्तान नीति में भारत को शामिल किए जाने की पेशकश की है. अपने इस बयान से भले ही उन्होंने सीधा इशारा नहीं किया है, लेकिन इतना ज़रूर सा़फ कर दिया है कि अमेरिका अ़फग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हर हालात में जीतना चाहता है और इस जीत के लिए उसे अगर भारत का सहारा लेना पड़ता है तो वह ज़रूर लेगा. हॉलब्रूक का यह बयान ऐसे व़क्‍त में आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री अ़फग़ानिस्तान पर आयोजित एक समिट के लिए लंदन रवाना हो रहे थे. इस समिट का आयोजन ब्रिटेन, संयुक्‍त राष्‍ट्र और अ़फग़ानिस्तान की पहल पर हुआ. इसमें दुनिया भर के देशों के विदेश मंत्री इस बात पर चर्चा करेंगे कि किस तरह से अ़फग़ानिस्तान में सैन्‍य और ग़ैर सैनिक संसाधनों का प्रयोग किया जाए और अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर अ़फग़ानिस्तान की समस्‍या से निपटने के लिए नीति बनाई जाए.

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इलियट के राज

अस्सी के दशक की एक फिल्म में नोबेल पुरस्कार विजेता एवं अंग्रेजी कविता को नई दिशा देने वाले कवि टी एस इलियट के पारिवारिक जीवन के कई अनछुए पहलुओं को दर्शाया गया था, जिसे लेकर अच्छा-ख़ासा विवाद खड़ा हो गया था.

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केजीबी का ऑपरेशन स्टॉर्म यानी एक राष्ट्रपति की हत्या

खुफिया दुनिया में जासूसों का अपनी पहचान बदलना कोई नई बात नहीं है. बहुरुपिए के तौर पर इन जासूसों ने कई ख़तरनाक और अहम मिशन को अंजाम दिया है. यही कहानी केजीबी के जासूस मितालियन टेलिबोव की है.

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क्या भारत को राष्ट्रपति शासन प्रणाली की ज़रूरत है?

आधी सदी के बाद भी भारत के संसदीय लोकतंत्र की तस्वीर धूमिल नज़र आती है. संसदीय पद्धति में चुनावी अंकगणित की मजबूरियां होती हैं, जिनकी वजह से भारत पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बंटा और बिखरा हुआ नज़र आता है. आज हमारी राजनीतिक व्यवस्था जाति, मज़हब और संप्रदायों में बंटी हुई है. आज भारत में कोई भी राजनीतिक दल ख़ुद को राष्ट्रीय स्तर का होने का दावा नहीं कर सकता है.

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